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‘हनुमान अंश’ : क्यों छू रही है लोगों के दिल?

इस फ़िल्म की ख़ूबसूरती यह है कि यह हल्की और सतही धार्मिकता वाली फ़िल्म नहीं है। यह सनातन संस्कृति की बुनियाद को छूने का प्रयास करती है। स्वयं की खोज में अपने आराध्य की खोज में भटकते-भटकते सेवा के लिए जीवन को समर्पित कर देना। जीवन की सार्थकता को अनुभव के धरातल पर उतारती है यह फ़िल्म। शायद इसी नाते लोगों के दिलों में आसानी से उतरने भी लगती है।

डेढ़ महीने बाद सही, परिवार सहित देखी ‘हनुमान अंश’। सोच रहा हूँ कि किसे इसे देखना चाहिए और किसे नहीं।

पहले अपनी कहूँ तो देखने गया था हमेशा की तरह एक फ़िल्म, पर कुछ देर बाद लगा कि अनुभव संसार फ़िल्म के फ़्रेम से बाहर निकल गया है। इतने साधारण लोगों ने इतनी साधारण चीज़ों के साथ इतने साधारण तरीक़े से फ़िल्म बनाई है कि साधारण और साधारण का गुणनफल आश्चर्यजनक रूप से असाधारण बन गया है। हाल यह है कि मुम्बई फ़िल्म जगत् चकित है कि ऐसा कैसे हो सकता है। दो करोड़ रुपये से भी कम में बनी फ़िल्म ठीक डेढ़ महीने बाद अपने पैंतालीसवें दिन भी लगभग 13.75 करोड़ रुपये कमा रही हो, तो ज़ाहिर है कि इसे बॉक्स ऑफ़िस का हिल जाना कहेंगे ही। यह कमाई सर्वाधिक कमाई वाली फ़िल्म ‘धुरन्धर’ के 45वें दिन से भी कई गुना अधिक है। ‘पुष्पा’ जैसी ब्लॉकबस्टर से तो सीधे 14 गुना अधिक।

किसी फ़िल्म को बड़े अनुनय-विनय के बाद केवल 250 स्क्रीन दी जाए और दो हफ़्ते बीतते-बीतते यह एकदम कम होकर 25 तक आ जाए, तो इससे बुरी स्थिति और क्या हो सकती है? फ़िल्म को फ्लॉप मानकर सिनेमाघरों से बाहर किया ही जाने वाला हो कि अचानक लगे कि लोगों की सङ्ख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है और स्क्रीन सङ्ख्या बढ़ाने में फ़ायदा दिखने लगे, तो इसे चमत्कार-जैसा ही माना ही जाएगा। आज जब यह टिप्पणी लिख रहा हूँ तो फ़िल्म 300 करोड़ रुपये के पार निकल चुकी है और लग रहा है कि 400 करोड़ के आसपास पहुँचकर ही रुकेगी।

मूल बात असल में कमाई की नहीं है। मूल बात है कि फ़िल्म में ऐसा क्या है कि इसे देखने सनातन धर्मप्रेमी ही नहीं, कुछ मुसलमान भी पहुँचे, जिनमें से कुछ तो चप्पल-जूते उतार कर सीट पर बैठे। एक फ़िल्म के लिए सिनेमाघरों का माहौल मन्दिर जैसा बनने लगे, तो कुछ तो ऐसा है जो दिलों को छू गया। कुछ लोगों को लगेगा कि फ़िल्म नीम करौरी बाबा के जीवन से जुड़े चमत्कारों पर है। काँग्रेस नेता राशिद अल्वी ने तो बिना देखे घोषणा कर दी कि ऐसी फ़िल्में बनाकर धार्मिकता की भावना बढ़ाई जा रही है, जो ठीक नहीं है। वास्तव में ऐसे लोगों के लिए यह फ़िल्म नहीं है और उन्हें देखनी भी नहीं चाहिए। जो लोग विज्ञान को केवल स्थूल रूप में जानते और मानते हैं, उन्हें भी यह फ़िल्म देखने के लिए सिनेमाघर तक जाकर समय नष्ट नहीं करना चाहिए। आजकल की वैज्ञानिकता के सहारे अन्धविश्वास का विरोध करके समाज को जागरूक बनाने में लगे लोगों के लिए भी यह फ़िल्म नहीं है।

हमारे कुछ आर्यसमाजी मित्र भी नीम करौरी बाबा के जीवन की ऐसी घटनाओं से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखेंगे, पर नीम करौरी बाबा के जीवन की घटनाओं से बहुत से आर्यसमाजियों को कोई परेशानी नहीं होगी। जिसे पतञ्जलि के योग दर्शन में भरोसा होगा और जिसने भी विभूतिपाद को समझने की कोशिश की होगी, उसके लिए रहस्य समझना ज़रा भी कठिन नहीं है। महर्षि दयानन्द सरस्वती अन्धविश्वासों, चमत्कारों के घोर विरोधी थे, लेकिन उनके जीवन की कई घटनाएँ हैं, जहाँ प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाई देते हैं। एक घटना यह है कि एक बार महर्षि दयानन्द एक छत के नीचे कुछ लोगों को कुछ पढ़ा-समझा रहे थे। तभी अचानक उन्होंने लोगों से कहा कि यहाँ से निकलो और बाहर चलकर बैठो। सब छत के नीचे से बाहर निकले और बाहर निकलने के कुछ ही मिनट बाद छत भरभरा कर गिर गई। एक दूसरी घटना है कि एक व्यक्ति महर्षि दयानन्द के दर्शन करने के लिए घर से निकला। रास्ते में याद आया कि एक सन्त पुरुष को भेंटस्वरूप देने के लिए साथ में कोई चीज़ लानी चाहिए थी। इस उधेड़बुन में उसे राह चलते एक मटर का खेत दिखा। उसने सोचा कि कुछ मटर की फलियाँ भी भेंट की जा सकती हैं। उसने खेत से मटर की फलियाँ तोड़ीं और गमछे में बाँध महर्षि के पास पहुँचा। महर्षि ने देखते ही कहा—”मुझे भेंट करने के लिए दूसरे के खेत से चोरी करके मटर की फलियाँ लाए हो?” उस व्यक्ति का हाल यह कि काटो तो ख़ून नहीं।

यहाँ ध्यान रहे कि मैं सामान्य अर्थों वाले चमत्कार की बात नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि अपने मूल में इस संसार में चमत्कार जैसा कुछ नहीं होता। हम जिसके पीछे का विज्ञान समझने में असमर्थ होते हैं, उसे अक्सर चमत्कार समझ लेते हैं। योग का दर्शन भी चमत्कार नहीं विज्ञान की बात करता है। हर चमत्कार के पीछे एक विज्ञान है, जिसे स्थूल दृष्टि से समझना कठिन है। ठीक वैसे ही जैसे कि होम्योपैथी दवा बनाने का तरीक़ा पूरी तरह विज्ञान है, परन्तु आधुनिक प्रचलित विज्ञान इसकी जाँच नहीं कर पाता, तो यह भी किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। मज़ेदार यह है कि केवल दवा बनाने के अविश्वसनीय तरीक़े के चलते ही अधिसङ्ख्य आधुनिक चिकित्सा विज्ञानी होम्योपैथी को एकदम से ख़ारिज कर देते हैं। वे मानते हैं कि इस तरीक़े से कोई दवा बन ही नहीं सकती और इस नाते किसी होम्योपैथिक दवा का कोई प्रभाव होना असम्भव है, जबकि सच यह है कि होम्योपैथी दवाएँ सही लक्षण मिलाते ही एलोपैथी से निराश रोगियों को भी आए दिन ठीक करती ही रहती हैं। थायरॉयड, मस्से और गोखरू या गट्टे जैसी साधारण परेशानियाँ, जिनका एलोपैथी में कोई स्थायी इलाज नहीं है, होम्योपैथी में महीने-दो महीने में हमेशा के लिए ठीक हो जाती हैं।

जो भी हो, माना जाता है कि प्रतिबद्ध साधक के जीवन में ऐसी चमत्कार जैसी चीज़ें होने ही लगती हैं, लेकिन असली साधक उन्हें उजागर करने में रुचि नहीं रखते। नीम करौरी बाबा का जीवन भी ऐसा ही था। वे चमत्कार दिखाने में विश्वास नहीं करते थे, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर किसी की मदद के लिए आगे आ जाते थे। इस फ़िल्म की ख़ूबसूरती यह है कि यह हल्की और सतही धार्मिकता वाली फ़िल्म नहीं है। यह सनातन संस्कृति की बुनियाद को छूने का प्रयास करती है। स्वयं की खोज में, अपने आराध्य की खोज में भटकते-भटकते सेवा के लिए जीवन को समर्पित कर देना। जीवन की सार्थकता को अनुभव के धरातल पर उतारती है यह फ़िल्म। शायद इसी नाते लोगों के दिलों में आसानी से उतरने भी लगती है।

फ़िल्म की पहली विशेषता ही शायद यह है कि यह आपको चमत्कार देखने के लिए नहीं बुलाती, बल्कि यह पूछने के लिए बुलाती है कि जिसे हम चमत्कार कहते हैं, उसके पीछे मनुष्य की कौन-सी यात्रा छिपी हुई है। नीम करौरी बाबा का जीवन यहाँ चमत्कारों की प्रदर्शनी बनकर सामने नहीं आता। बचपन से लेकर गृहस्थ जीवन और फिर धीरे-धीरे साधना की ओर बढ़ते हुए एक ऐसे मनुष्य की यात्रा दिखाई जाती है, जिसके भीतर कोई प्रश्न लगातार जागता रहता है। और उस प्रश्न का उत्तर उसे संसार में नहीं, अपने भीतर खोजना है। यही बात फ़िल्म को केवल किसी सन्त के जीवन की घटनाओं का चलचित्र बनने से बचाती है।

फ़िल्म में एक और बात बहुत ध्यान खींचती है। इसमें बड़े-बड़े संवादों से अध्यात्म समझाने का प्रयास नहीं किया गया है। कई बार एक छोटा-सा प्रसङ्ग ही बहुत कुछ कह जाता है। कहीं किसी के प्रति करुणा, कहीं किसी की सहायता, कहीं किसी के दुःख को बिना पूछे समझ लेना और कहीं अपने सामने घट रही घटना को ऐसे देखना, जैसे उसके पीछे छिपी हुई कोई दूसरी परत भी दिखाई दे रही हो। ये ही छोटे-छोटे प्रसङ्ग मिलकर बाबा के व्यक्तित्व को बनाते हैं। फ़िल्म बार-बार यह नहीं कहती कि देखिए, ये महान सन्त हैं; बल्कि घटनाएँ धीरे-धीरे आपको यह अनुभव करने देती हैं।

और शायद यही कारण है कि फ़िल्म में हनुमान जी केवल आराध्य के रूप में नहीं आते। बाबा के जीवन में हनुमान-भक्ति कोई अलग से जोड़ा गया धार्मिक प्रसङ्ग नहीं लगती। वह उनके व्यक्तित्व की धुरी बन जाती है। सेवा, समर्पण, अहङ्कार से दूरी और अपने आराध्य के प्रति पूरा विश्वास—ये सब बातें हनुमान-भक्ति के भीतर से निकलती हुई दिखाई देती हैं। इसीलिए फ़िल्म का नाम ‘हनुमान अंश’ भी केवल लुभावना शीर्षक नहीं रह जाता। वह बाबा के जीवन को समझने की एक कुञ्जी बन जाता है।

फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक इसका अभिनय पक्ष है। निर्देशक और लेखक विशाल चतुर्वेदी ने नीम करौरी बाबा की कथा को जिस सहजता से पर्दे पर उतारा है, वह ध्यान खींचती है। नीम करौरी बाबा की भूमिका निभाने वाले शोभिनव सत्य ने बाबा को किसी पारम्परिक फ़िल्मी सन्त की तरह निभाने की कोशिश नहीं की है। चेहरे पर हर समय गम्भीरता, हर वाक्य में भारीपन और हर दृश्य में चमत्कार दिखाने की बेचैनी—इन सबके बजाय उनके अभिनय में एक सहज बेफ़िक्री दिखाई देती है। बाबा का हठ भी है, बालसुलभता भी है, करुणा भी है और अपने आराध्य के प्रति एक विचित्र-सी आत्मीयता भी। यही सहजता चरित्र को विश्वसनीय बनाती है।

बाल्यकाल के प्रसङ्गों में भी फ़िल्म की यही ख़ूबी दिखाई देती है। बालक के रूप में उनका प्रकृति और जीव-जगत् से अलग तरह का सम्बन्ध, संसार की सामान्य धारणाओं से उनका धीरे-धीरे अलग होना और फिर जीवन के आगे के पड़ावों में उसी अन्तर्मुखी खोज का गहरा होते जाना—इन घटनाओं को किसी सुपरहीरो की उत्पत्ति की तरह नहीं दिखाया गया है। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी लगती है, जो संसार के बीच रहते हुए भी संसार से अलग कुछ और खोज रहा है। कई दृश्य ऐसे हैं, जो आँखें नम करने लगते हैं। हो सकता है कि आपकी आँखों से आँसू ढुलक पड़ें और आपको बाद में इसका एहसास हो।

फ़िल्म में रामबेटी का प्रसङ्ग भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बाबा की आध्यात्मिक यात्रा के बीच उनका पारिवारिक जीवन अचानक कोई बाधा बनकर सामने नहीं आता; बल्कि यह प्रसङ्ग उस मनुष्य को सामने लाता है, जो बाद में सन्त के रूप में जाना गया। पति-पत्नी के बीच दूरी, सम्बन्ध की गरिमा और बिना अधिकार जताए किसी के प्रति प्रेम बनाए रखना—इस छोटे-से प्रसङ्ग में बहुत कुछ कह दिया गया है। यही कारण है कि फ़िल्म केवल नीम करौरी बाबा के चमत्कारों या आध्यात्मिक जीवन की कथा नहीं रह जाती, बल्कि उनके आसपास के मनुष्यों की भावनाओं को भी जगह देती है।

फ़िल्म का एक और महत्त्वपूर्ण गुण है इसका संयम। आज किसी धार्मिक या आध्यात्मिक विषय पर फ़िल्म बनानी हो तो बड़े-बड़े दृश्य, भारी-भरकम वीएफएक्स, चमत्कारों को असाधारण बनाने वाली तकनीक और धूम-धड़ाके वाले सङ्गीत पर ज़ोर दिया जाता है। ‘हनुमान अंश’ उस रास्ते पर नहीं जाती। यहाँ साधारण दृश्य-संयोजन और सीमित साधनों के भीतर कथा कही गई है। फ़िल्म की भव्यता उसके बजट में नहीं, उसके भाव में है। यही वह बात है, जिसे बड़े बजट की फ़िल्मों के बीच यह छोटी-सी फ़िल्म उलटकर दिखाती है। यानी कभी-कभी दर्शक को बाँधने के लिए दृश्य जितना बड़ा होना आवश्यक समझा जाता है, कहानी उससे कहीं बड़ी हो सकती है।

इसीलिए इस फ़िल्म की कमियाँ भी उसी दृष्टि से देखनी होंगी। कुछ जगहों पर गति धीमी पड़ती है। कहीं-कहीं घटनाओं के बीच का सङ्क्रमण उतना सहज नहीं लगता और बाबा की ख्याति जिस व्यापक रूप में फैली, उसका विस्तार भी बहुत अधिक नहीं मिलता। लेकिन यहाँ एक विचित्र बात है—जिस फ़िल्म की मूल प्रकृति ही ठहरकर देखने की है, उसमें हर क्षण कहानी को दौड़ाते रहने की अपेक्षा शायद कुछ वैसी ही होगी जैसे किसी ध्यानस्थ व्यक्ति से पूछा जाए कि आप इतनी देर से बैठे क्यों हैं। और यहाँ आकर फ़िल्म की सुस्त रफ़्तार उसकी विशेषता जैसी लगने लगती है।

फ़िल्म देखते हुए एक बात बार-बार ध्यान में आती है—नीम करौरी बाबा की कथा का केन्द्र चमत्कार नहीं, सेवा है। यदि चमत्कार होते भी हैं तो वे कथा के केन्द्र में नहीं बैठते। केन्द्र में मनुष्य है, उसका दुःख है और उस दुःख के प्रति दूसरे मनुष्य का व्यवहार है। कोई भूखा है तो भोजन, कोई परेशान है तो सहायता, कोई निराश है तो आश्वासन और कोई अपने भीतर के अन्धकार में भटक रहा है तो उसे अपने भीतर देखने की प्रेरणा। शायद यही कारण है कि फ़िल्म देखने के बाद याद रहने वाले दृश्य केवल वे नहीं हैं, जिनमें कोई असाधारण घटना घटती है; वे दृश्य भी उतनी ही देर तक साथ रहते हैं, जिनमें बाबा किसी सामान्य मनुष्य के दुःख के सामने खड़े दिखाई देते हैं।

और यहीं आकर ‘हनुमान अंश’ की कथा मेरे लिए फिर उस पहली बात पर लौट आती है—फ़िल्म के फ़्रेम से बाहर निकल जाने वाली बात। शायद इसी को फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता कहा जा सकता है। पर्दे पर चलने वाली कहानी ढाई घण्टे में समाप्त हो जाती है, लेकिन यदि वह दर्शक के भीतर कोई प्रश्न छोड़ दे, कोई अनुभव छोड़ दे या जीवन को देखने की दृष्टि में थोड़ी-सी हलचल पैदा कर दे, तो उसके बाद चलने वाली फ़िल्म की अवधि सिनेमाघर की घड़ी से नहीं मापी जा सकती।

‘हनुमान अंश’ मेरे लिए ऐसी ही फ़िल्म है। यह फ़िल्म आपको बहुत कुछ दिखाने का दावा नहीं करती; बल्कि जो दिखाती है, उसके भीतर कुछ खोजने के लिए छोड़ देती है। यह केवल बॉक्स ऑफ़िस की कहानी नहीं है। यह इस बात का सङ्केत भी है कि दर्शक के भीतर अभी भी ऐसी कहानियों के लिए जगह है, जो उसे केवल उत्तेजित नहीं करतीं, बल्कि कुछ देर के लिए भीतर की ओर मोड़ देती हैं। यह फ़िल्म देखने के बाद दर्शक आह्लाद या दुःख लेकर सिनेमाघर से बाहर नहीं निकलता, बल्कि मन शान्त होने की कोशिश करता है। (सन्त समीर)

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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