स्त्री को ‘औरत’ बोलना बन्द कीजिए!
अरब की संस्कृति में नारी, स्त्री या महिला एक जननाङ्ग भर है। वैसे ‘जननाङ्ग’ भी नहीं कहना चाहिए, क्योंकि संस्कृत का यह शब्द एक व्यापक और अच्छे अर्थवाला है, जबकि ‘औरत’ शब्द में जिस जननाङ्ग का भाव है, वह बस भोग्य वस्तु है। सामान्य अर्थ में गुप्ताङ्ग कहें तो ग़नीमत है। ‘औरत’ का मूल अर्थ गुप्ताङ्ग ही होता है।
ऐसे अनेक शब्द हैं, जो मूल में होते कुछ हैं, लेकिन हम उन्हें समझते कुछ हैं। हम भारतवासियों के वर्तमान व्यवहार में भी कुछ ऐसे शब्द हैं, जो मूलतः हमारी संस्कृति से निकले शब्द नहीं थे, परन्तु हमने उन्हें इतनी बार सुना कि बिना भावार्थ पर ध्यान दिए ही अपना बना लिया। आज का हाल यह है कि नई पीढ़ी को इस बात का अनुमान तक नहीं रहा कि बाहरी संस्कृतियों से हमारे यहाँ आ गए और हमारे दैनन्दिन व्यवहर का हिस्सा बन गए ये शब्द वास्तव में हमारे लिए उपयुक्त नहीं थे।
ऐसा ही एक शब्द है—औरत; जिसकी वास्तविकता जान लेने के बाद भारतीय संस्कृति में विश्वास करने वाला कोई भी व्यक्ति अपने रोज़मर्रा के व्यवहार में शायद ही इसका प्रयोग करना कभी पसन्द करेगा।
इस देश का पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो या अनपढ़, हर कोई हर दिन दो-चार बार ‘औरत’ शब्द बोलता ही होगा। लेकिन, इसकी वास्तविकता क्या है, यह किस भाषा से आया, इन सब बातों पर शायद ही कुछ लोग ध्यान देते होंगे।
यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बाहरी संस्कृतियों से आए सारे ही शब्दों के प्रयोग में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता नहीं है; या कि सारे ही शब्द अनुपयोगी नहीं हैं। उदाहरण के लिए ऊपर मैंने भी बाहरी संस्कृतियों से आए कई शब्द प्रयोग किए, जैसे कि—हाल, पसन्द, हिस्सा, रोज़मर्रा। ये सब अरबी और फ़ारसी के शब्द हैं। ‘हाल’ शब्द को मैंने जिस अर्थ में प्रयोग किया है, वह अर्थ उसके अरबी रूप से निकलता है। ‘हाल’ शब्द फ़ारसी में भी है, पर वहाँ उसका अर्थ इलाइची, नाच, सुख-चैन, चौगान के खेल की गेंद आदि है। ‘हाल’ संस्कृत और हिन्दी में भी है, पर अर्थ एकदम अलग है। खेत जोतने वाला ‘हल’ वास्तव में ‘हाल’ ही है।
‘पसन्द’ शब्द फ़ारसी का है और अच्छा शब्द है। ‘हिस्सा’ शब्द अरबी से आया है और अंश या टुकड़ा का ठीक अर्थ देता है। यह बात अलग है कि अरबी संस्कृति में मीलाद या शादी-ब्याह के अवसर पर जो मिठाई बाँटी जाती है, उसे भी हिस्सा (हिस्सः) कहते हैं। सङ्क्षेप में इतना समझना चाहिए कि किसी का जन्म हो तो वह मीलाद का अवसर है। हज़रत मुहम्मद साहब की याद में जब कोई कथा आयोजित की जाती है, तो उस कथा-सभा को भी मीलाद कहते हैं। जैसे कि सनातन संस्कृति में रामकथा और श्रीमद्भागवत् कथा आदि का आयोजन होता है।
इसी तरह ‘रोज़मर्रा’ भी अच्छा शब्द है। ‘रोज़’ फ़ारसी का शब्द है और ‘मर्रा’ (मर्रः) अरबी का। दोनों मिले तो ‘रोज़मर्रा’ बन गया। ‘रोज़’ का अर्थ है, दिन या दिवस। ‘मर्रा’ (मर्रः) का अर्थ है—एक बार या कुछ बार या हो चुकी घटना। इस तरह ‘रोज़मर्रा’ शब्द ‘हर दिन होने वाली घटना’ का भाव देता है।
अब आइए, उस ‘औरत’ शब्द पर, जिसे हम बिना सोचे-समझे प्रयोग करते हैं और भारत की नारी-शक्ति का अपमान करते हैं। स्त्री-शक्ति का अपमान करते हैं। वास्तव में ‘औरत’ शब्द अरबी संस्कृति से होते हुए भारत में पहुँचा है। मुग़ल आक्रान्ताओं ने अपनी संस्कृति के हिसाब से इसका प्रयोग बार-बार किया तो हमने भी इसे ‘स्त्री’ या ‘नारी’ का पर्याय मान लिया, जो कि वास्तव में ठीक नहीं है।
आगे बढ़ने से पहले यहीं पर स्त्री, नारी जैसे शब्दों के भावों को भी अतिसङ्क्षेप में समझते चलें तो ठीक रहेगा। कुछ लोग ‘औरत’ को ‘स्त्री’ के समकक्ष रखना चाहते हैं, पर भावार्थ पर ध्यान देंगे तो ‘स्त्री’ और ‘औरत’ में ज़मीन-आसमान का अन्तर दिखाई देगा। ‘स्त्री’ शब्द बना है ‘स्त्यै’ धातु में ‘डट्’ और ‘ङीप्’ प्रत्यय जोड़कर। इसका अर्थ बनता है कि मनुष्य जाति की जिस उपजाति में गर्भधारण के लिए सारे आवश्यक अङ्ग पूरी गरिमा के साथ उपस्थित हों, वह स्त्री है। आशय यह है कि गर्भ धारण का पूरा सामर्थ्य जिसमें हो, वह स्त्री है। इसीलिए ‘स्त्री’ शब्द को किसी बच्ची के लिए प्रयोग करना बहुत उपयुक्त नहीं है। ‘स्त्री’ शब्द में वयस्कता का भाव है। स्त्री अ-वयस्क हो तो बालिका या लड़की है। स्त्री को इतना बड़ा स्थान हमारे वेदों में दिया गया है कि संसार की किसी भी संस्कृति में ऐसा नहीं मिलेगा। स्त्री के लिए ऋग्वेद के आठवें मण्डल के तैंतीसवें सूक्त का उन्नीसवाँ मन्त्र कहता है—”स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ।” इस मन्त्र में स्त्री को देवत्व के ब्रह्मा तत्त्व के समकक्ष रखा गया है।
‘स्त्री’ के बाद अब ‘नारी’ शब्द को सङ्क्षेप में समझते हैं। ‘नारी’ शब्द को सामान्य रूप से ‘नर’ का स्त्रीलिङ्ग मान लिया जाता है। प्रगतिशील क़िस्म के कुछ लोग भारतीय संस्कृति को कमतर सिद्ध करने के लिए आरोप लगाते हैं कि आख़िर पुरुष वर्चस्व की बात न होती तो इस ‘नारी’ को ‘नर’ के स्त्रीलिङ्ग के रूप में क्यों बनाया जाता? लेकिन बात स्त्रीलिङ्ग-पुंल्लिङ्ग तक सीमित नहीं है। ‘नर’ और ‘नारी’ दोनों शब्द ‘नृ’ धातु से बने हैं और ‘नृ’ धातु का मूल भाव ‘नर’ और ‘नारी’, दोनों में समान भाव से उपस्थित है। ‘नृ’ धातु ‘नर’ और ‘नारी’, दोनों को एक-दूसरे समानान्तर खड़ा करता है और दोनों के लिए ही नेतृत्वकारी भूमिका का भाव देता है। ‘नृ’ यानी ‘नृ नये…नृणाति’—अर्थात् ले जाना, पहुँचना, नेतृत्व करना। नारी का माहात्म्य समझने के लिए हमें ‘नृ’ धातु और ‘अच्’, ‘अञ्’ और ‘ङीन्’ प्रत्ययों के मर्म को कुछ और समझना पड़ेगा, लेकिन इसे अधिक विस्तार देना ठीक नहीं, क्योंकि इस लेख का हमारा मुख्य विषय ‘औरत’ शब्द की वास्तविकता बताना है। यहाँ बस इतना समझना चाहिए कि नारी जन्मदात्री है, ममत्व का आगार है, जीवन-सृजन की नेतृत्वकर्त्री है। बताने की आवश्यकता नहीं कि सृष्टि के सञ्चालन में ये ही गुण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
यहीं पर ‘महिला’ शब्द को भी बहुत सङ्क्षेप में समझते चलें कि यह ‘मह्’ धातु में ‘इलच्’ और ‘टाप्’ प्रत्यय जोड़कर बना है। ‘मह्’ धातु सम्मान देने का भाव देता है। ‘मह पूजायाम्’—अर्थात् सम्मान करना; पूज्य भाव रखना।
इस प्रकार जब ‘महिला’ शब्द आकार लेता है, तो उसमें सम्मान और पूज्य भाव भी समाहित हो जाता है। महिला, वह स्त्री या नारी है, जो अपने गुणों के कारण विशेष रूप से सम्मान के योग्य है। महिला भद्र नारी है, सम्मानित स्त्री है।
अब आइए ‘औरत’ शब्द का सच ठीक से समझते हैं। बात देखने में छोटी लग सकती है, पर सङ्केत गहरे हैं। वास्तव में हमारा जैसा सांस्कृतिक वातावरण होता है, उसी तरह से हम अपनी भाषा को भी आकार देते हैं। स्त्री के प्रति अरब में कभी पूज्य भाव नहीं रहा। स्त्री एक भोग्य वस्तु के रूप में ही देखी-समझी गई। इसी नाते मुस्लिम समाज वाले अनेक देशों में लड़कियों की शिक्षा पर प्रायः तलवार लटकती रही है। स्त्रियों को हाशिये पर भारतीय समाज में भी डाला गया है, परन्तु यह समय के प्रवाह में जन्म लेने वाली कुरीतियों के चलते हुआ है, हमारी संस्कृति की मूल मान्यताओं में ऐसा नहीं मिलेगा।
भारतीय समाज में पुरुषों के समकक्ष ही स्त्रियाँ भी वेदमन्त्रों की ऋषिकाएँ रही हैं। अत्रि, मैत्रेयी, अपाला, घोषा जैसी नारियों का आसन कभी पुरुषों से नीचे नहीं रहा है। वे पुरुषों के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद और शास्त्रार्थ करती रही हैं। प्राचीन भारत की स्त्रियाँ अपने लिए वर अपनी पसन्द से चुनने के लिए स्वतन्त्र रही हैं। सनातन संस्कृति में स्त्रियाँ गृहस्थी का आधा हिस्सा हैं, वामाङ्गी हैं, अर्धाङ्गिनी हैं। आज हम पालन कितना करते हैं, इस पर प्रश्न हो सकता है, परन्तु विवाह संस्कार में सप्तपदी के समय दूल्हा-दुल्हन के अन्तिम फेरे में अब भी बोला जाता है कि ‘सखे सप्तपदी भव’। भाव यह है कि स्त्री पैरों की जूती नहीं है। विवाह के समय के इस वचन में सङ्कल्प है कि कोई समस्या आए तो पति-पत्नी सखा यानी मित्र भाव से एक साथ मिल-बैठकर उसे सुलझाएँ। सखा भाव की व्याख्या अद्भुत है, परन्तु यहाँ इसे विस्तार देना उपयुक्त नहीं होगा।
जो भी हो, भारतीय संस्कृति के विपरीत अरब की संस्कृति में नारी, स्त्री या महिला एक जननाङ्ग भर है। वैसे ‘जननाङ्ग’ भी नहीं कहना चाहिए, क्योंकि संस्कृत का यह शब्द एक व्यापक और अच्छे अर्थवाला है, जबकि ‘औरत’ शब्द में जिस जननाङ्ग का भाव है, वह बस भोग्य वस्तु है। सामान्य अर्थ में गुप्ताङ्ग कहें तो ग़नीमत है। ‘औरत’ का मूल अर्थ गुप्ताङ्ग ही होता है। ऐसी हर वस्तु औरत की परिभाषा में है, जिसे देखकर लज्जा महसूस हो। अद्भुत है कि प्राचीन भारत में मनुष्य का गुप्ताङ्ग कभी लज्जा का विषय नहीं रहा है। याद रहे कि जननाङ्ग सामान्य रूप से सनातन संस्कृति में गुप्त अङ्ग ही है, पर यह गुप्त या ढँकने का भाव अरब वाली निन्दित लज्जा नहीं है, इसके कारण और हैं। भारत में एक स्थिति में जननाङ्ग पवित्र बन जाता है, पर अरब की संस्कृति में यह हमेशा से लज्जाजनक रहा है।
हिन्दी शब्दकोशों में ‘औरत’ शब्द का अर्थ जब आप देखेंगे तो वहाँ इसके मूल अर्थ का पता नहीं मिलेगा, क्योंकि हमने बेध्यानी में इसे बस स्त्री या नारी के रूप में मान लिया है।
‘औरत’ शब्द अपनी जड़ों में पूरी तरह से अरबी है। यह जिस अरबी धातु [ ع و ر (अ-व-र)] से बना है, उसका मूल अर्थ ‘अधूरा होना’, ‘दोषपूर्ण होना’ या ‘सुरक्षित न होना’ से सम्बन्धित है। समझिए कि मूल भाव में ही गड़बड़झाला है। सञ्ज्ञा रूप में यह [ عورة ] ‘औरत’ है, जिसका प्राथमिक शाब्दिक अर्थ था ‘गुप्ताङ्ग’, ‘छिपाने योग्य अङ्ग’ या ‘लज्जा का स्थान’।
क़ुरआन में ‘औरत’ शब्द का प्रयोग उन कमज़ोर या असुरक्षित स्थानों के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिन्हें सुरक्षित करना ज़रूरी है। उदाहरण के लिए, क़ुरआन के सूरा अल-अहज़ाब (३३:१३) में इसका प्रयोग एक ऐसे ‘असुरक्षित स्थान’ या ‘कमज़ोरी’ के लिए हुआ है, जहाँ से किसी शहर पर हमला हो सकता है।
‘औरत’ शब्द का हदीसों में व्यापक प्रयोग मिलता है। एक प्रसिद्ध हदीस जो सुनन अत-तिर्मिज़ी (Hadith 1173) में मिलती है, उसमें कहा गया है—”निश्चित रूप से औरत यानी स्त्री एक ‘औरत’ अर्थात् छिपाने योग्य वस्तु है। जब वह बाहर निकलती है, तो शैतान उसे घूरता है।”
इससे समझा जा सकता है कि गुप्ताङ्ग का पर्याय ‘औरत’ कोई स्वतन्त्र और गरिमामयी नहीं, बल्कि ‘छिपाने योग्य वस्तु’ है। औरत का मूल्य उसके मन, बुद्धि या योग्यता से नहीं, उसके शरीर से जुड़ा है।
जब मुग़ल आक्रान्ता भारत में आए तो उनके लिए भारत की स्त्रियाँ, नारियाँ, महिलाएँ, सब ‘औरतें’ थीं, और अन्ततः भोग्य वस्तु थीं। इसीलिए युद्धों में यदि मुग़ल जीत जाते थे, तो हारी हुई सेना की स्त्रियों पर एक तरह से कहर ही टूट पड़ता था। हमने साम्प्रदायिक सद्भभाव को ध्यान में रखकर बाज़ारों में बेच दी गईं और बलात्कार की शिकार हिन्दू बच्चियों, स्त्रियों से सम्बन्धित अनगिनत हृदयविदारक घटनाओं पर परदा डाल दिया है, तो वह एक अलग बात है। मुस्लिम धर्मग्रन्थों तक में ‘काफ़िरों की औरतों’ को ग़ुलाम बनाने के बाद किसी वस्तु की तरह ही उपभोग करने की बात कही गई है।
ठीक इसके उलट, भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में हारी हुई सेना की स्त्रियों को इस तरह से ग़ुलाम बनाने की बात नहीं मिलेगी। यहाँ पराई स्त्री की ओर बुरी दृष्टि से देखना भी पापबोध जगाता है। बात बस इतनी है कि औरत शब्द आज भले स्त्री, नारी, महिला आदि के अर्थ में प्रयोग किया जाने लगा है, पर मूल भाव इसका जो है, उसे देखते हुए भारतीय सन्दर्भों में हमें इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। निश्चित रूप से ‘औरत’ शब्द नारी की गरिमा को घटाता है। बात यह भी है कि जब हमारे पास स्त्री या नारी से जुड़े हर परिस्थिति के हिसाब से अनेकानेक शब्द हैं, तो फिर दुर्बलता के प्रतीक किसी और शब्द को अपनाने की आवश्यकता क्या है? वास्तव में सनातन संस्कृति में स्त्री के लिए अलग-अलग सन्दर्भों के अनुसार जितने अर्थपूर्ण शब्द हैं, उन्हें जानना ही अपने-आपमें महान् गौरवबोध से गुज़रना है। उदाहरण के लिए कुछ शब्द हैं—नारी, वनिता, प्रमदा, कामिनी, रमणी, महिला, ललना, अङ्गना, योषिता, सीमन्तिनी, भार्या, दयिता, दारा, गृहिणी, सहधर्मिणी, वामा। इन सभी शब्दों की व्युत्पत्ति और व्याख्या में यदि हम उतरना शुरू करें, तो आश्चर्य से भर उठेंगे कि कैसे ये सभी शब्द नारी को अलग-अलग परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग रूपों में गहरे भावों के साथ प्रस्तुत करते हैं। (सन्त समीर)

