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प्रोपेगैण्डा बनाम सिनेमा : ‘धुरन्धर-2’ की परतें

फ़िल्मवाले कितने भी समझदार बन जाएँ, पर अन्त में अपनी मूर्खता दिखा ही देते हैं। फ़िल्म के अन्त में लिखा दिखता है—बलिदान परमों धर्मः। दो सौ करोड़ लगाने के बाद भी संस्कृत वाक्य में वर्तनी की गड़बड़ी तक ठीक न हो पाई। …बहरहाल, फ़िल्म इतनी धमाकेदार है कि वर्षों तक याद रखी जाएगी। एक तबक़ा ‘वाह’ करते हुए याद रखेगा, तो दूसरा ‘आह’ करते हुए।

कुछ मित्रों ने राय जाननी चाही तो आख़िरकार सिनेमाहॉल में जाकर ‘धुरन्धर-2’ देखी। चार घण्टे की फ़िल्म देखने जाना हो तो दिल्ली जैसी जगह में कम-से-कम साढ़े पाँच से छह घण्टे का समय चाहिए। मेरे जैसे मज़दूर आदमी के लिए इतनी फ़ुरसत आसानी से कहाँ मिलती है! मित्रों ने बार-बार टोका न होता तो मन में यही था कि अमेजॉन प्राइम या नेटफ़्लिक्स वग़ैरह पर आएगी तो देखूँगा।

ख़ैर, तीन हफ़्तों में पुरवा सुहानी से लेकर पछुवाई तक का अन्धड़ खेल जितना चलना था चल चुका है, इसलिए यह पोस्ट सिर्फ़ उन्हीं मित्रों की हिम्मत को समर्पित है, जिन्होंने मेरी राय के लिए इतना लम्बा इन्तज़ार किया। फ़िल्म कुछ पहले देखी होती तो लम्बा लेख लिखता, परन्तु आज राह चलते बस कुछ फुटकर बातें बिन्दुवार लिख रहा हूँ।

—एक—

फ़िल्म विधा में थोड़ी भी रुचि है, तो दोनों ‘धुरन्धर’ बिना देखे मोक्ष नहीं मिलने वाला।

—दो—

फ़िल्मवाले कितने भी समझदार बन जाएँ, पर अन्त में अपनी मूर्खता दिखा ही देते हैं। फ़िल्म के अन्त में लिखा दिखता है—बलिदान परमों धर्मः। दो सौ करोड़ लगाने के बाद भी संस्कृत वाक्य में वर्तनी की गड़बड़ी तक ठीक न हो पाई।

—तीन—

फ़िल्म इतनी धमाकेदार है कि वर्षों तक याद रखी जाएगी। एक तबक़ा ‘वाह’ करते हुए याद रखेगा, तो दूसरा ‘आह’ करते हुए।

—चार—

फ़िल्म के ऐतिहासिक सन्दर्भों को लेकर ‘प्रोपेगैण्डा फ़िल्म’ का जो आरोप लगाया जा रहा है, फ़िल्म देखने के बाद उसकी सच्चाई आप आसानी से समझ जाएँगे। सिनेमाहॉल से बाहर निकलते-निकलते आप यह भी समझ जाएँगे कि प्रोपेगैण्डा फ़िल्म का आरोप लगाने वाले वास्तव में किस मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं।

—पाँच—

दोनों ‘धुरन्धर’ देखने के बाद यदि आपने ऐसे विषय पर महान् कही गई कुछ पुरानी फ़िल्मों पर विचार किया, तो आपको यह अजीब रहस्य पता चलेगा कि हमारी महान् कही गई फ़िल्मों में से ज़्यादातर असली वाली प्रोपेगैण्डा फ़िल्में थीं।

—छह—

‘धुरन्धर-2’ में रहमान डकैत की कमी खली, पर इतनी भी नहीं कि खलने लायक़ कही जाए।

—सात—

यह फ़िल्म आह्वान करती है कि फ़िल्म देखने आएँ, तो पुरानी आदत को बदलें और पहले की तरह दिमाग़ को घर पर छोड़कर आने की भूल न करें।

—आठ—

बेहतर है कि इस फ़िल्म को बड़े परदे पर देखा जाए और एकाध हफ़्ते बाद दूसरी बार भी अवश्य देखें, अन्यथा अतीत के जिन धागों को आपस में जोड़ा गया है, उनके ताने-बाने को ठीक से समझ पाना कठिन होगा। यह भी कि ‘धुरन्धर-2’ देखने से पहले ‘धुरन्धर-1’ अवश्य देख लें।

—नौ—

जो यह कहा जा रहा है कि आदित्यधर ने आतङ्कवाद की जड़ पर प्रहार किया है, तो यह सरासर गप्प है और अति उत्साह में दिया जा रहा बयान है। फ़िल्म ने केवल आतङ्कवाद के पत्ते और तने पर प्रहार किया है, जड़ को तो छुआ तक नहीं है। जिस जगह पर हमजा (नाम ‘हमजा’ है या ‘हमज़ा’ मैंने ध्यान नहीं दिया। दोनों के अर्थ अलग हैं) और मेजर यानी अर्जुन रामपाल की लड़ाई होती है, वहाँ मेजर के कुछ संवाद ज़रूर आतङ्कवाद की जड़ से जोड़े जा सकते थे, परन्तु ऐसा हुआ नहीं है। आतङ्कवाद की जड़ को समझने के लिए आदित्यधर को कुछ दिनों तक एक्स-मुस्लिमों की सङ्गत में रहना चाहिए।

—दस—

नोटबन्दी से लेकर अतीक अहमद तक की घटनाओं को कमाल की समझदारी से जोड़ा गया है। हालाँकि लाइनों में लगकर परेशान होने की जो कहानी है, वह भी एक बात है। इन दोनों घटनाओं पर मैं इसलिए बात कर सकता हूँ, क्योंकि अतीक अहमद की जो बात है, तो मैं भी उसी शहर से हूँ; और, नोटबन्दी की जो बात है, तो जिनकी वजह से नोटबन्दी हुई, उन अनिल बोकिल की दिल्ली के पत्रकारों के साथ उस समय की दो बड़ी बैठकें मैंने ही कराई थीं। कुछ नेताओं और स्वामी रामदेव वग़ैरह से मिलने-मिलाने का कार्यक्रम तय कराने में भी मैं साथ था।

—ग्यारह—

फ़िल्म में कहीं कुछ कमज़ोर लगा तो वह है दाऊद इब्राहीम वाला दृश्य। आदित्यधर ने दिमाग़ तो लगाया है, परन्तु मरणासन्न दाऊद को भी ‘मरा हाथी सवा लाख का’ स्टाइल में नमूदार होना चाहिए था।

—बारह—

मोदी युग को इसलिए धन्यवाद देना चाहिए कि आदित्यधर जैसे फ़िल्मकार को जगह मिली। काँग्रेस के ज़माने में ‘कश्मीर फ़ाइल्स’, ‘केरला स्टोरी’ और ‘धुरन्धर’ जैसी फ़िल्में बनाने का विचार करना भी कठिन होता। यहाँ यह भी याद कर लें कि ‘केरला स्टोरी’ को प्रोपेगैण्डा कहने वाले अल-फलाह युनिवर्सिटी से लेकर एकदम ताज़ा टीसीएस काण्ड तक की दर्जनों घटनाओं पर केवल दायें-बायें झाँकने में लगे हैं। इस फ़िल्म से यह समझने में आपको मदद मिलेगी कि जो लोग प्रोपेगैण्डा- प्रोपेगैण्डा बहुत ज़्यादा चिल्लाते रहे हैं, वे वास्तव में ऐसा इसलिए करते रहे हैं, ताकि उनके कुनबे के ‘एजेण्डा’ पर किसी का ध्यान न जाए।

—तेरह—

अब तक की अधिकतर फ़िल्में पाकिस्तान के गुनाहों पर परदा डालने का काम करती रही हैं। ‘धुरन्धर’ ने दबे-सहमे मन को खुलकर व्यक्त होने की खिड़की खोली है। ऐसा लगता है, इस्लामी ‘अलतकियाह’ के छद्म के आवरणहीन होने का समय अब नज़दीक है।

—चौदह—

‘धुरन्धर’ देखने के बाद कुछ पुरानी फ़िल्मों को मन के तल पर उतारिए तो आपको समझ में आएगा कि यदि एक तरफ़ आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान हमारे देश में आतङ्कवाद के बीज बो रहा था, कश्मीर से कश्मीरी पण्डित भगाए जा रहे थे और दूसरी तरफ़ हमारी फ़िल्में शेर ख़ान, इमाम साहब, अब्दुल्लाह जैसे शानदार, वफ़ादार चरित्र गढ़ने में लगी थीं, तो इसके पीछे कौन-सी मानसिकता काम कर रही थी।

—पन्द्रह—

वर्षों से लोगों के मन में जो अस्फुट-सा खदबदाता रहा है, उसे स्फुट ध्वनि में बदलती है यह फ़िल्म।

—सोलह—

फ़िल्म को फ़िल्म की तरह देखिए। दृश्यात्मक रूप से मनोरञ्जन और सङ्केतात्मक रूप से फ़िल्मी दस्तावेज़ की तरह। इसे कोई कलात्मक दस्तावेज़ मानने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु इसने कुछ ऐसी हरकत पैदा की है कि कला के नाम पर आज़ादी के बाद से ही चल रहा चालाकी का खेल अब आम आदमी भी समझना शुरू कर सकता है।

—सत्रह—

फ़िल्म के सङ्केत ठीक-ठाक हैं, परन्तु दृश्य दूसरी तमाम फ़िल्मों से कई मायनों में बेहतर होते हुए भी स्पष्ट रूप से अतिरञ्जना के शिकार हैं। बावजूद इसके, इसकी आलोचना का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि फ़िल्में अन्ततः खेल-तमाशे का ही दूसरा नाम हैं। इस सच को समझने के बाद यह भी समझ ही सकते हैं कि ऐसी फ़िल्म बनाते समय रञ्जन का उद्देश्य बिना अतिरञ्जना के कहाँ सम्भव है?

—अठारह—

हक़ीक़त में गालियाँ कहीं ज़्यादा वीभत्स होती हैं, बावजूद इसके बिना गालियों के भी फ़िल्म आगे बढ़ सकती थी।

—उन्नीस—

‘धुरन्धर’ ने अपनी कमियों-कमज़ोरियों के बावजूद फ़िल्म-निर्माण की दिशा में मील का पत्थर गाड़ ही दिया है। ‘धुरन्धर’ के आतङ्क में सलमान ख़ान को अपनी फ़िल्म का नाम बदलना पड़ रहा है और कुछ दृश्यों को दुबारा फ़िल्माना पड़ रहा है, परन्तु बात अब और दूर तलक जाएगी और कई परिभाषाएँ भी बदलेंगी। ‘धुरन्धर’ ने असुविधाजनक विषयों को छूने का रास्ता खोला है। ऐसी फ़िल्में अब खुले मन से बननी चाहिए, ताकि ज़रूरी विषयों पर भी मुलम्मा चढ़ाकर बात करने की परम्परा कुछ थमे और कला-संस्कृति की आड़ में आतङ्कवादी हरकतों के लिए ‘कवर फायर’ देने का काम बन्द हो। मैं समझता हूँ कि साम्प्रदायिक सद्भाव का सही रास्ता तलाशने के लिए सबसे पहले सच को बेपरदा देखना-पहचानना ज़रूरी है।

—बीस—

फ़िल्म की कमाई पर ध्यान दे भी सकते हैं और नहीं भी दे सकते हैं। कमाई इतनी अविश्वसनीय न होती तो एजेण्डा-प्रोपेगैण्डा की कोई बहस भी शायद न चलती। कमाई इशारा कर रही है कि देश का आमजन मूर्ख हो, बौड़म हो या कि समझदार, परन्तु यह वही आमजन है, जिसने पिछली अनेकानेक फ़िल्मों को भी देखा या नकारा था। ‘धुरन्धर’ में उसे कुछ तो मन का लगा, जो उसने महँगे टिकट, वयस्क श्रेणी और हद से कुछ अधिक लम्बाई के बावजूद सिनेमाहॉल तक बिना किसी प्रचार अभियान के भी जाने की ज़हमत उठाई। जुनून यह कि लोग फ़िल्म देखकर सवेरे चार बजे तक घर लौट रहे थे। कुछ मुस्लिम देशों ने अपने यहाँ रिलीज़ नहीं होने दिया, क्योंकि उन्हें इस्लाम ख़तरे में नज़र आ रहा था। चीन में भी रिलीज़ नहीं हुई। यदि ऐसी बन्दिशें न होतीं तो आप सोच सकते हैं कि इसकी कमाई कहाँ तक पहुँचती। (सन्त समीर)

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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