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रस से रीत रही भाषा

मुहावरे अकेले कमरे में नहीं बनते। वे चौपालों में बनते हैं। खेतों में बनते हैं। साझे दुःख-सुख में बनते हैं। जब लोग साथ बैठना छोड़ देते हैं, तो भाषा से रङ्ग कम होने लगते हैं। पहले शामें लम्बी थीं। लोग बतियाते थे। कहानियाँ सुनाते थे। किस्सों में भाषा चमकती थी। अब हर व्यक्ति अपनी स्क्रीन में व्यस्त है। बातचीत कम हुई, इसलिए भाषा का लोक भी सिकुड़ गया।

भाषा मुहावरेदार हो तो परीक्षक पर प्रभाव अच्छा पड़ता है; सो, विद्यार्थी ने लम्बे-चौड़े निबन्ध में एक मुहावरेदार वाक्य यह लिखा—“कारख़ाने में तोते की आवाज़ कौन सुनता है?”

इस दौर का विद्यार्थी बेचारा और क्या लिखे? नक़्क़ारा ही नहीं देखा, तो नक़्क़ारख़ाना कैसे समझ पाता? लगा कि कारख़ाना होगा। तूती की आवाज़ भी कभी न सुनी तो तूती के बजाय तोता समझ में आया।

नैनिहालों के इस हाल पर हँसी आती है, पर ज़्यादा देर तक नहीं। थोड़ी ही देर में महसूस होने लगता है कि यह महज़ एक विद्यार्थी की ग़लती नहीं है; यह हमारी पूरी पीढ़ी की सांस्कृतिक दूरी का बयान है। मुहावरे, लोकोक्तियाँ अब हमारी ज़िन्दगी से वैसे ही निकलते जा रहे हैं, जैसे गाँवों से बैलगाड़ियाँ, चौपालें और अलाव। आने वाली पीढ़ियाँ शायद सचमुच यह नहीं समझ पाएँगी कि आख़िर नक़्क़ारख़ाना होता क्या था, तूती क्यों बोलती थी और उसकी आवाज़ कोई क्यों नहीं सुनता था!

भाषा का भी अजब स्वभाव है। वह सिर्फ़ शब्दों से नहीं बनती; अपने समय, समाज और जीवन-पद्धति से रस लेती है। लोकभाषाएँ किताबों में पैदा नहीं होतीं। वे मिट्टी में उगती हैं। वे मौसमों के साथ बदलती हैं। उनमें हल-बैल की चाल होती है, कुएँ की गहराई होती है, रिश्तों की गरमी होती है। इसलिए लोकभाषा में इतने मुहावरे थे कि आदमी चाहे दुःख कहे या प्रेम—बात सीधी दिल में उतरती थी।

जीवन बदलता है तो भाषा का प्रवाह भी बदलता है। जिन चीज़ों का हमारे जीवन से रिश्ता टूटता जाता है, उनसे जुड़े शब्द भी धीरे-धीरे अनाथ होने लगते हैं। अब बच्चे न उखल देख रहे हैं, न मूसल, न चरखा, न जाँता; तो फिर ‘जाँते में पिसना’ या ‘मूसलचन्द’ जैसे मुहावरों का अर्थ वे कैसे समझें? ‘ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डर’ लोकोक्ति अभी जब-तब ज़बान पर तैरती मिल जाती है, परन्तु आजकल के सुनने वाले अक्सर पूछ बैठते हैं कि यह ओखली क्या होती है और मूसल किस बला का नाम है!

एक समय था, जब लोक के लिए भाषा सिर्फ़ बोलने की ही चीज़ नहीं थी। यह साँस-साँस जी जाती थी। खेत से लेकर खलिहान तक, कुएँ से लेकर चौपाल तक, विवाह के नाच-गाने से लेकर शोक के करुण रुदन तक—हर जगह अलग तरह की भाषा थी। आदमी की उम्र के साथ उसका सम्बोधन बदलता था।

छुटपन के लिए ‘लल्ला’, ‘मुन्ना’, ‘मुन्नी’, बबुआ जैसे सम्बोधन आम थे, भले ही बच्चे का नाम कुछ भी हो। रङ्ग काला हो तो ‘कलुआ’ या ‘काले’, गोरा हो तो ‘गोरू’ या ‘भूरू’, गोल-मटोल हो तो ‘गोलू’, ‘पोटू’ या ‘छोटू’ और टोटके वाले घुरहू, पतवारू, फेंकन, खेदन जैसे सम्बोधन भी चलन में रहते थे। लेकिन इनमें उपेक्षा नहीं, अगाध प्रेम और दुलार झलकता था। ये ही लाडले जब ज़रा सयाने होकर युवावस्था की दहलीज़ पर क़दम रखते, तो गाँव के अधिकार और अपनत्व का लहज़ा भी बदल जाता। तब औपचारिक नामों की कतर-ब्योंत करके उनके पीछे ‘वा’ या ‘आ’ की पूँछ जोड़ दी जाती और रमेश ‘रमेसर’ या ‘रमेसवा’ और सुरेश ‘सुरेसा’ या ‘सुरेसवा’ हो जाता। यह किसी का मज़ाक उड़ाना नहीं, बल्कि इस बात का खुला ऐलान था कि यह लड़का अब सिर्फ़ एक घर का नहीं, बल्कि पूरे टोले-मुहल्ले का अपना है। इसी उम्र में अगर कोई लड़का दो अक्षर पढ़-लिख जाता, तो सम्मान और अपनत्व के मिले-जुले भाव से पूरा गाँव उसे ‘बाबू साहब’, ‘मुंशी जी’ या ‘मास्टर’ कहकर पुकारने लगता, जो उसके युवा कन्धों पर सामाजिक दायित्व का एक अनकहा अहसास भी था।

यही जीवन-यात्रा जब ढलती उम्र की छाँव में पहुँचती, तो इन युवाओं के व्यक्तिगत नाम गाँव की ज़ुबान से धीरे-धीरे ओझल होने लगते और उनकी जगह सामूहिक रिश्ते ले लेते। तब वे किसी एक परिवार के दायरे से निकलकर पूरे गाँव के ‘बाबा’, ‘ताऊ’, ‘काका’, ‘चाचा’, ‘बड़के बाबा’, ‘छोटके बाबा’ या बुज़ुर्ग महिलाएँ ‘दादी’, ‘काकी’, ‘माई’, ‘बड़की माई’, ‘छोटकी माई’ बन जातीं। यदि कहीं नाम लेने की ज़रूरत आ ही पड़ती, तो बेहद अदब के साथ ‘रामखिलावन बाबा’ या ‘सुखदेव भगत जी’ जैसे आदरसूचक शब्द जुड़ जाते। कई बार तो उनकी अपनी पहचान नई पीढ़ी के हवाले हो जाती और वे ‘फलाने के बप्पा’ या ‘अमुक के दादा’ कहलाने लगते। सच कहें तो बचपन के ‘लल्ला’ से लेकर जवानी के ‘रमेसर’ और बुढ़ापे के ‘रमेश बाबा’ बनने तक का यह सफ़र लोक संस्कृति की उस जीवन्त आत्मीयता का गवाह है, जहाँ इनसानी रिश्तों को काग़ज़ी औपचारिकता से नहीं, बल्कि दिल के सीधे जुड़ाव से सींचा जाता रहा है।

एक आदमी अपने जीवन में जाने कितनी भाषाई यात्राएँ करता हुआ बूढ़ा होता था….।

अब शहरों में पाँच साल का बच्चा भी कई बार सीधे नाम से पुकारा जाता है। रिश्तों के भीतर की जो मिठास भाषा में घुली रहती थी, वह धीरे-धीरे छीज रही है। पहले किसी के घर जाइए तो आवाज़ आती थी—“आओ-आओ, बड़ा दिन पर परान दिखाई दिए!” अब दरवाज़े पर लिखा मिलता है—“प्लीज़ कॉल बिफ़ोर विज़िट!”

सिर्फ़ व्यवहार ही नहीं बदला, मनुष्य की संवेदना की अभिव्यक्ति भी करवट बदलने लगी है। पहले गाँव की कोई बूढ़ी स्त्री दुख में कहती थी—“कलेजा मुँह को आ रहा है।” कोई बहुत परेशान हो तो—“जान सूत पर टँगी है।” कोई ख़ुशी से भर जाए तो—“मन अँजोर हो गया।” अब हम कहते हैं—“मैं बहुत स्ट्रेस में हूँ।”

लोकभाषाओं में आदमी अपने पूरे मन के साथ मौजूद था। आज की भाषा में सूचना ज़्यादा है, आत्मीयता कम। बचपन के दिन याद आते हैं कि पहले लोग पूछते थे—“खा लिए कि अभी रोटी धरूँ?” अब पूछा जाता है—“लञ्च हुआ?…डिनर कहाँ करेंगे?” पहले कोई दूर यात्रा पर निकलता था तो माँ कहती थी—“देखभाल के रहना बेटा, रास्ता बड़ा बेदर्द होता है।” अब संदेश आता है—“टेक केयर!”

भाषा में यह जो रूखापन आया है, वह अचानक नहीं है। इसके पीछे पूरी जीवन-शैली का बदलना है। गाँवों में आदमी अकेला नहीं रहता था। उसका जीवन सामूहिक था। सुख-दुख साझा थे। खेतों में साथ काम, चौपाल पर साथ बैठना, कुएँ पर औरतों की बतकही, मेले-ठेले, बारहमासा गीत—इन सबने भाषा को रस दिया था। अब आदमी अपने-अपने कमरों और मोबाइलों में बन्द है। बोलना-बतियाना कम हुआ तो भाषा भी सिकुड़ने लगी।

एक समय था कि गाँव के किसी घर में मृत्यु हो जाए तो पूरे गाँव की भाषा बदल जाती थी। एक का दर्द पूरे गाँव के चेहरे पर झलकता था। लोग धीरे बोलते थे। वाक्यों में करुणा उतर आती थी। कोई कहता—“बहुत भला आदमी था।” कोई कहता—“ईश्वर परिवार को धीरज दे।” कोई बुज़ुर्ग चुपचाप आकर कन्धे पर हाथ रख देता था। अब कई बार शोक तक ‘RIP’ में निबट जाता है।

भाषा के भीतर से जीवन का तापमान कम हुआ है।

पिछली पीढ़ी वाले याद कर सकते हैं कि पहले लोकभाषाओं में हँसी के कितने रूप थे! कोई खिलखिलाकर हँसता था, कोई फिस्स से हँस देता था, कोई मन्द-मन्द मुसकाता था, कोई ठठाकर हँसता था। गाँवों की बूढ़ियाँ कहती थीं—“ऐसे हँस रही है जैसे धूप में धान चमक रहा हो।” किसी बच्चे की हँसी पर कहा जाता—“फूल झर रहे हैं।” अब सब कुछ जैसे ‘लॉफ़्टर’ में सिमट गया है। ‘फूटे गुड़ जैसी हँसी’ अब दुर्लभ हो गई है।

प्रेम की भाषा का हाल और भी दिलचस्प है। हिन्दी और उसकी लोकबोलियों में प्रेम के कितने शब्द थे—पिया, साजन, बलम, साँवर, सजनी, प्रीतम, मनमोहन, जियरा, मोहन, कन्त, सइयाँ, करेजा… हर शब्द में प्रेम का अलग ताप था। विरह के अलग शब्द, मिलन के अलग। लोकगीतों में स्त्री कहती थी—“नयनवा नीर भरि आए।” कहीं वह कहती—“अँखियाँ पथरा गईं।” अब प्रेम भी कई बार ‘मिस यू’ की भाषा में पूरा कर लिया जाता है। किसी नवविवाहिता के चेहरे का रङ्ग देखकर बूढ़ी औरतें तक समझ जाती थीं कि वह ख़ुश है या उदास। पूछती थीं—“का हो, मन नहीं लग रहा?” और लड़की बस मुसकरा देती थी। पूरा संवाद आँखों और आधे वाक्यों में हो जाता था। भाषा इतनी आत्मीय थी कि पूरा दुख कहे बिना समझ लिया जाता था। बन्द होठों की भाषा का भी अपना लोक व्याकरण था।

अब आदमी बहुत बोलता है, पर समझता कम है।

यह नहीं कि नई भाषा में सब कुछ बुरा ही है। बदलाव की भी एक धारा है। समय नए मुहावरे भी रचता है। हर दौर अपनी भाषा बनाता है। आज भी मुहावरे बन रहे हैं— ‘घोस्ट कर देना’, ‘सीन मारना’, ‘वायरल होना’, ‘ट्रोल करना’, ‘रील लाइफ़’, ‘स्क्रीन टाइम’, ‘ऑनलाइन रहना’। ये भी समय के दस्तावेज़ हैं, लेकिन इनमें लोक की मिट्टी कम है। ये डिजिटल दुनिया की उपज हैं—तेज़, क्षणिक और अक्सर भावहीन।

प्रश्न है कि भाषा क्यों सूख रही है, तो उत्तर है—क्योंकि जीवन बदल गया है।

मुहावरे अकेले कमरे में नहीं बनते। वे चौपालों में बनते हैं। खेतों में बनते हैं। साझे दुःख-सुख में बनते हैं। जब लोग साथ बैठना छोड़ देते हैं, तो भाषा से रङ्ग कम होने लगते हैं। पहले शामें लम्बी थीं। लोग बतियाते थे। कहानियाँ सुनाते थे। किस्सों में भाषा चमकती थी। अब हर व्यक्ति अपनी स्क्रीन में व्यस्त है। बातचीत कम हुई, इसलिए भाषा का लोक भी सिकुड़ गया। आज का युवक कहता है—“दिमाग़ हैंग हो गया।”, “पूरा सिस्टम बैठ गया।”, “वह तो बड़ा अपडेटेड आदमी है।”, “बात वायरल हो गई।”, “नेटवर्क डाउन है।” भाषा हर दौर में अपने औज़ार बदलती है। लेकिन चिन्ता तब होती है, जब नया आने के साथ पुराना पूरी तरह मिटने लगे या दकियानूसी लगने लगे।

पुराने मुहावरों में जीवन का लम्बा अनुभव छिपा होता था। ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ केवल कमी का बयान नहीं, रेगिस्तानी जीवन का अनुभव भी है। ‘घर का भेदी लङ्का ढाए’ के भीतर पूरा रामायणकालीन सांस्कृतिक स्मृति संसार बैठा है। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ ग्रामीण समाज की सत्ता संरचना का बयान है। ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ उस समय की धीमी यात्राओं का अनुभव है। ‘सूप बोले तो बोले, चलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद’—यह केवल व्यङ्ग्य नहीं, लोकबुद्धि की चमक है।

कबीर की ‘रमैया की दुलहिन लूटे बजार’ को लोकजीवन में ‘मगरुआ की दुलहिन लूटै बजार’ के वाग्बन्ध रूप में हम अनुभव करते रहे हैं। अब नई पीढ़ी के सामने सङ्कट यह है कि उसकी मुहावरों की दुनिया सिमटती जा रही है। कई बच्चों को ‘आसमान सिर पर उठाना’ समझ में नहीं आता। वे सचमुच सोचने लगते हैं कि आसमान भला कोई उठा कैसे सकता है!

हमारी लोकभाषाएँ दरअसल अनुभवों की जीवित सङ्ग्रहालय थीं। खेती-बाड़ी से जुड़े ही कितने शब्द हुआ करते थे! खेत अगर पानी से भर जाए तो उसके लिए अलग शब्द, बस नमी रह जाए तो अलग। बैलों की चाल के अलग नाम। इन सबके बीच जो भाषा पैदा होती थी, उसमें मिट्टी की गन्ध होती थी। अब मौसम मोबाइल ऐप बता रहा है। छोटी-बड़ी अनगिन मशीनों से घिरते समाज में अब नया शब्द-संसार आकार ले रहा है। खटिया, मचिया, गोनरी, भेली, भदेली, बिड़वा जैसे दैनन्दिन व्यवहार के शब्द अब ज़बान से उतरने लगे हैं। बादलों के रङ्ग और चाल आसमान में नहीं बदले हैं, पर नई पीढ़ी की ज़बान में बदलने लगे हैं। बादलों का ‘घुमड़ना’ तो ख़ैर अभी समझ में आता है, पर इस पीढ़ी के लिए बारिश की ‘झिर्री’ नहीं लगती और न ही कहीं ‘झपसी’ आती है। धूप सिर्फ़ धूप नहीं थी, वह ‘घाम’ भी थी। उजाला ‘अँजोर’ था। आदमी का आकाश से सीधा रिश्ता टूट रहा है, तो भाषा का भी टूटना स्वाभाविक है।

लोकभाषाओं में प्रकृति सिर्फ़ पृष्ठभूमि नहीं थी, परिवार का हिस्सा थी। गाँव-गिराँव का लोकमानस तुलसी से भी बतियाता था, चिड़ियों से भी। बच्चे को चाँद दिखाकर खिलाया जाता था। खेत की मेड़ों तक के नाम होते थे। अब बहुमञ्ज़िला इमारतों में रहने वाली पीढ़ियाँ कई बार यह नहीं समझ पातीं कि ‘मेड़ टूटना’ केवल मिट्टी टूटना नहीं, किसान के मन का टूटना भी होता था।

पहले किसी के घर बेटी पैदा होती थी तो दादी कहती थी—“लक्ष्मी आई है।” बेटा पैदा हो तो—“कुलदीपक आया।” आज अस्पताल के बाहर कई बार बस इतना सुनाई देता है—“बेबी बॉय” या “बेबी गर्ल”! आधुनिकता ने सूचनाएँ बढ़ाई हैं, पर कई बार भाषा की भाव-सम्पदा घटा दी है।

चिट्ठियों की भाषा का भी अपना संसार था। लोग लिखते थे—“यहाँ हम सब राज़ी-ख़ुशी हैं और आपकी कुशलता भगवान् से चाहते हैं।” फिर नीचे लिखा जाता—“कम को ज़्यादा समझना, चिट्ठी पाते ही जवाब देना, बड़ी चिंता रहती है।” अब संवाद ‘Seen’ और ‘Typing…’ के बीच अटका रहता है।

पहले लोग बातों में भी कविता कर लेते थे। गाँव का अनपढ़ आदमी भी कई बार ऐसी बात कह देता था कि बड़े-बड़े लेखक दङ्ग रह जाएँ। अब अभिव्यक्तियों का दायरा सिमट रहा है, तो कारण यह नहीं कि आदमी के भीतर भाव कम हो गए हैं; कारण यह है कि जीवन की गति इतनी तेज़ हो गई है कि आदमी को अपने भावों को शब्द देने का अवकाश ही कम मिलता है। सोशल मीडिया ने भाषा को तेज़ तो बनाया है, पर कई बार उथला भी। पहले चिट्ठियाँ लिखी जाती थीं। लोग पूरा मन उड़ेल देते थे। अब इमोजी भेज दिए जाते हैं। पहले लोग कहते थे—“तुम्हारे बिना घर काटने को दौड़ता है।” अब लिखा जाता है—“Miss you!”

लोकभाषा के साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह हुई कि आधुनिकता ने उसे कई बार पिछड़ेपन का प्रतीक बना दिया। शहर पहुँचा आदमी अपनी बोली छिपाने लगा। गाँव की बोलियों को लेकर हीनभावना पैदा की गई, जबकि सच यह है कि लोकभाषाएँ या बोलियाँ किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पूँजी होती हैं। अवधी, भोजपुरी, ब्रज, बुन्देली, मैथिली, मालवी, मगही, राजस्थानी, हरियाणवी, कुमाऊँनी, गढ़वाली—इन सब बोलियों ने सदियों तक भारत के जनजीवन को शब्द दिए हैं। कबीर, तुलसी, सूर, मीरा, विद्यापति—इनकी ताक़त ही लोकभाषा थी। लोकभाषाएँ न होतीं तो भारतीय कविता का आधा वैभव ही पैदा न होता।

दुनिया के भाषाविद् कहते हैं कि जब कोई भाषा मरती है तो उसके साथ दुनिया को देखने का एक पूरा ढङ्ग भी मर जाता है। भाषा केवल शब्दों का ढेर नहीं होती; वह अपने समाज की स्मृति, संवेदना, अनुभव और दर्शन को लेकर चलती है।

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, मनुष्य की आत्मा का घर भी होती है। सोचना चाहिए कि दुनिया में सबसे ग़रीब आदमी क्या वह है, जिसके पास धन कम है; अथवा सबसे ग़रीब वह है, जिसकी भाषा से उसके लोक के शब्द चले गए हैं! (सन्त समीर) ….साभार : अहा ज़िन्दगी

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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