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जब गालियाँ भाषा बनने लगें

भारत की गालियों में अश्लीलता भरने में मुग़ल आक्रमण और इस्लामी संस्कृति का भरपूर योगदान रहा है। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि अरबी भाषा का जो ‘औरत’ शब्द आज हम सबकी जिह्वा पर चढ़ा हुआ है, उसका मूल अर्थ है— ‘गुप्ताङ्ग’, ‘छिपाने योग्य अङ्ग’ या ‘लज्जा का स्थान’। बहुत से लोगों को आश्चर्य होगा, परन्तु यह सच है कि ‘औरत’ का मूल अर्थ ‘गुप्ताङ्ग’ होता है। ऐसी हर वस्तु औरत की परिभाषा में है, जिसे देखकर लज्जा महसूस हो।

पिछले दिनों दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर हुए छात्र आन्दोलन में जैसी भाषा नई पीढ़ी की ज़बान से निकली, उसके चलते यह सवाल हवा में तैरने लगा है कि क्या गालियाँ और अपशब्द नए ज़माने की नई भाषा को आकार देने वाले असली उपकरण बन गए हैं। जेन Z के नाम पर प्रचारित यह भाषा क्या आज के समाज की सहज भाषा बन गई है? प्रश्न बेचैन कर रहा है कि क्या समाज को इस भाषा के साथ ही बहने दिया जाए या इसकी जड़ों की तलाश होनी चहिए? चिन्ता इसलिए ज़रूरी है कि भाषा केवल भाषा नहीं होती, सभ्यता-संस्कृति की वाहक होती है, हमारे स्वयं के व्यक्तित्व के साथ-साथ हमारे परिवार, समाज और देश तक के व्यवहार-संस्कार का पता देती है।

बच्चा इस दुनिया में आता है तो उसकी मुट्ठियाँ बन्द होती हैं, पर कान खुले होते हैं। बोलना उसे बहुत बाद में आता है, पर सुनना पहले दिन से शुरू कर देता है। सच तो यह है कि उसके कान गर्भावस्था में भी आवाज़ों की टोह ले रहे होते हैं। माँ की लोरी, पिता की आवाज़, दादी की कहानी, आँगन की बतकही, गली-मोहल्ले की पुकार—यही सब गुज़रते दिनों के साथ धीरे-धीरे उसके भीतर एक अदृश्य संसार को आकार देते हैं। शब्दों का यह संसार इतना गहरा होता है कि जब बच्चा पहली बार बोलता है, तब वह केवल भाषा नहीं बोल रहा होता, अपने पूरे परिवेश का परिचय दे रहा होता है। इसीलिए किसी छोटे बच्चे के मुँह से कोई अपशब्द सुनकर पहले लोग चौंक उठते थे। उन्हें उस एक शब्द से उतना दुःख नहीं होता था, जितना इस बात से कि यह शब्द आख़िर उसके कानों तक पहुँचा कहाँ से! बच्चे शब्द गढ़ते नहीं, उन्हें विरासत में पाते हैं। घर की सबसे बड़ी पैतृक सम्पत्ति कई बार मकान नहीं, भाषा होती है।

वाणी में उतरता व्यक्तित्व :

भाषा का भी अपना चरित्र होता है। कोई भाषा सिर झुकाकर चलती है, कोई सीना तानकर; कोई बाँह पकड़ लेती है, कोई उँगली उठाने लगती है। कुछ शब्द ऐसे होते हैं कि सुनते ही मन में फूल खिल उठते हैं और कुछ ऐसे कि जैसे किसी ने तीर चलाकर कलेजा चीर दिया हो। भाषा केवल यह नहीं बताती कि हम क्या बोलते हैं; वह यह भी बता देती है कि हम कौन हैं। मनुष्य के कपड़े उसके साधन बताते हैं, पर उसकी भाषा उसके संस्कार बताती है। यही कारण है कि हमारे समाज में किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी प्रशंसा यह नहीं मानी जाती थी कि वह बहुत धनी है या बहुत विद्वान् है। लोग कहा करते थे—“आदमी बड़ा मीठा बोलता है।” इस एक वाक्य में उसके पूरे व्यक्तित्व का परिचय समा जाता था। उसकी शिक्षा, उसका परिवार, उसका स्वभाव, उसका मन—सब कुछ जैसे उसकी वाणी में उतर आता था।

यह बात केवल दैनन्दिन लोकानुभव नहीं है। आधुनिक भाषाविज्ञान भी कमोबेश इसी निष्कर्ष तक पहुँचता है। बीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध भाषाविद् एडवर्ड सपिर और उनके शिष्य बेंजामिन ली व्हॉर्फ़ ने यह विचार रखा कि भाषा केवल विचारों को व्यक्त नहीं करती, बल्कि मनुष्य के सोचने के ढङ्ग को भी प्रभावित करती है। बाद के शोधों ने उनके विचारों में कई संशोधन किए, पर एक बात आज भी व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है कि मनुष्य जिस भाषिक वातावरण में जीता है, वही उसके अनुभवों को व्यवस्थित करने का ढङ्ग भी गढ़ता है। भाषा केवल मन की अभिव्यक्ति नहीं, मन की निर्माता भी है। यही कारण है कि शब्द बदलते हैं तो धीरे-धीरे समाज का स्वभाव भी बदलने लगता है।

इसीलिए हमारे यहाँ भाषा को केवल व्याकरण का विषय नहीं माना गया। वह व्यवहार का विषय थी, संस्कार का विषय थी। बच्चों को वर्णमाला के साथ-साथ वाणी की मर्यादा भी सिखाई जाती थी। “बड़ों से ऐसे बात नहीं करते”, “पहले प्रणाम करो”, “कोई आए तो बैठने को कहो”, “क्रोध में भी ज़बान नहीं बिगड़नी चाहिए”—ये बातें किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं थीं, फिर भी हर घर की शिक्षा का अनिवार्य अङ्ग थीं। आज भी पिछली पीढ़ी के लोग याद कर सकते हैं कि यदि किसी बच्चे के मुँह से गाली निकल जाए तो घर के बुज़ुर्ग कहते थे—“बेटा, यह हमारे घर की भाषा नहीं है।” कितना बड़ा वाक्य है यह! उसमें बच्चे की डाँट कम, परिवार की भाषिक परम्परा की रक्षा की चिन्ता अधिक थी। बुज़ुर्गों को एहसास था कि भाषा काम बनाती है, तो भाषा काम बिगाड़ती भी है।

भाषा में बसे रिश्ते :

भारतीय लोकजीवन की ओर देखिए तो भाषा का यह संस्कार और भी अद्भुत रूप में दिखाई देता है। हमारी लोकभाषाओं ने शायद संसार की सबसे समृद्ध सम्बोधन-परम्परा विकसित की। अपरिचित आदमी भी ‘भैया’ था, खेत का किसान ‘काका’ था, गली की वृद्धा ‘माई’ थी, राह चलती स्त्री ‘बहिन’ थी। किसी गाँव में जाइए तो आधे लोग एक-दूसरे के रक्त सम्बन्धी नहीं होते थे, पर भाषा ने सबको रिश्तों में बाँध रखा था। दुकानदार ग्राहक को ‘बाबूजी’ कहता था। रिक्शेवाला ‘बैठिए मालिक’ कहता था। अतिथि के लिए ‘पधारिए’ था, विदा के लिए ‘जल्दी ही आइएगा’। अभिवादन भी केवल औपचारिक नहीं था। ‘राम-राम’, ‘जै राम जी की’, ‘राधे-राधे’, ‘जय जिनेन्द्र’, ‘सत श्री अकाल’ या ‘नमस्ते/नमस्कार’—इन सबमें सामने वाले के मङ्गल की कामना भी छिपी रहती थी। भाषा पहले सम्मान देती थी, परिचय बाद में पूछती थी।

सोचिए, जिस समाज ने अपरिचित मनुष्य तक को रिश्ते में बदल देने वाली भाषा रची हो, वहाँ गाली का स्थान कितना छोटा रहा होगा! हमारे यहाँ तो कटु सत्य भी कहने के लिए भाषा ने मर्यादा खोज ली थी। इसलिए ऋषियों ने कहा—“सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्।” सत्य बोलो, पर ऐसा नहीं जो केवल चोट पहुँचाने के लिए बोला जाए। कबीर ने जिह्वा को साधने की बात कही। रहीम ने वाणी को मोती से अधिक मूल्यवान कहा। तुलसीदास ने कटु वचन को बाण से भी अधिक घातक माना। यह सब केवल नैतिक शिक्षा नहीं थी। सदियों के सामाजिक अनुभव का निचोड़ था। हमारे पूर्वज जानते थे कि तलवार कभी-कभी एक शरीर को घायल करती है, पर भाषा पूरे समाज को घायल भी कर सकती है और जोड़ भी सकती है।

शब्दों से गाली तक :

समाज का इतिहास उठाकर देखिए तो पाएँगे कि भाषा हमेशा सत्ता से बड़ी शक्ति रही है। साम्राज्य मिट गए, राजधानियाँ उजड़ गईं, राजवंश बदल गए, पर लोगों की बोली बची रही। बोली के लिए लोगों ने अपने ही पन्थ-मज़हब के लोगों से लड़ाइयाँ लड़ीं। किसी देश की असली पहचान उसके क़िले नहीं, उसकी भाषा होती है। कोई विदेशी भारत आता है तो उसे सबसे पहले ताजमहल नहीं मिलता, सबसे पहले किसी चायवाले का “आइए साहब!” सुनाई देता है। कोई पर्यटक जापान से लौटकर वहाँ की रेलगाड़ियों की जितनी चर्चा करता है, उससे कहीं अधिक वहाँ के लोगों के विनम्र व्यवहार की करता है। राष्ट्रों की प्रतिष्ठा केवल उनकी अर्थव्यवस्था से नहीं बनती; उनके नागरिकों की भाषा भी उसे गढ़ती है। इसे हम अपने अतीत में भी पहचान सकते हैं। भारत सदियों तक संसार के लिए व्यापार, विज्ञान से लेकर संस्कार तक का प्रेरक बना रहा, तो उसके पीछे उसका भाषिक व्यवहार भी था। प्राचीन संस्कृत भाषा की परम्परा में ‘गाली’ शब्द वहीं से निकलता दिखाई देता है, परन्तु दिलचस्प है कि संस्कृत साहित्य में ‘गाली’ का संसार आज जैसा नहीं मिलता। वहाँ कटु वचन हैं, दुर्वचन हैं, अपशब्द हैं, पर माँ-बहन को लक्ष्य बनाकर अश्लील गालियों की परम्परा लगभग अनुपस्थित है। मूर्ख, दुष्ट, खल, पाखण्डी, पापात्मा, अधम, पामर, दुर्मति, मूर्खप्राणी, धूर्तप्राणी, दुराचारी—यही उस समय की कठोरतम गालियाँ थीं। यह अन्तर बताता है कि किसी समाज की गालियाँ भी उसकी संस्कृति का इतिहास लिखती हैं।

भारत की गालियों में अश्लीलता भरने में मुग़ल आक्रमण और इस्लामी संस्कृति का भरपूर योगदान रहा है। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि अरबी भाषा का जो ‘औरत’ शब्द आज हम सबकी जिह्वा पर चढ़ा हुआ है, उसका मूल अर्थ है— ‘गुप्ताङ्ग’, ‘छिपाने योग्य अङ्ग’ या ‘लज्जा का स्थान’। बहुत से लोगों को आश्चर्य होगा, परन्तु यह सच है कि ‘औरत’ का मूल अर्थ ‘गुप्ताङ्ग’ होता है। ऐसी हर वस्तु औरत की परिभाषा में है, जिसे देखकर लज्जा महसूस हो। इस तरह से हम आसानी से समझ सकते हैं कि इस्लामी संस्कृति में स्त्री के केन्द्र में उसका यौनाङ्ग रहा है, वह मुख्यतः भोग की वस्तु रही है। ऐसे में उसका यौनाङ्ग ही उसके मान-मर्दन का भी केन्द्र बना, तो अपमान के लिए उससे जुड़े शब्द भी ख़ूब चलन में आते गए। भारतीय संस्कृति में अलग-अलग परिस्थितियों के हिसाब से स्त्री के लिए अनेक अर्थपूर्ण शब्द हैं, परन्तु इस तरह से कहीं भी कोई अपमानजनक शब्द नहीं मिलेगा। उदाहरण के लिए—नारी, वनिता, प्रमदा, कामिनी, रमणी, महिला, ललना, अङ्गना, योषिता, सीमन्तिनी, भार्या, दयिता, दारा, गृहिणी, सहधर्मिणी, वामा—जैसे अनेक शब्द। इन शब्दों के मूल भावों पर ध्यान देंगे, तो भाषा ही नहीं, सभ्यता-संस्कृति के भी अनेक अद्भुत रहस्यों का पता मिलेगा। ‘स्त्यै’ धातु से बने ‘स्त्री’ शब्द का मूल भाव है कि जिसमें सन्तति उत्पन्न करने के सारे अवयव विकसित हों, वह स्त्री है। जब समाज में नारी विशेष सम्मान का पात्र होने लगती है तो वह ‘महिला’ हो जाती है। ‘महिला’ के मूल में उपस्थित ‘मह्’ धातु का सङ्केत यही है। ऐसे ही अन्य शब्दों को भी देखा जा सकता है।

जो भी हो, वर्तमान तक आते-आते आज का समय हमें बेचैन करता है। पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक जीवन की भाषा तेज़ी से बदली है। मतभेद पहले भी थे, आन्दोलन पहले भी होते थे, सत्ता के विरुद्ध आवाज़ें पहले भी उठती थीं; पर पिछले दिनों दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर छात्रों के प्रदर्शन में जिस तरह अपशब्दों और गालियों का खुला प्रयोग सुनाई दिया, उसने एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने खड़ा कर दिया। प्रश्न किसी दल, सङ्गठन या विचारधारा का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी सार्वजनिक भाषा का स्वभाव बदल रहे हैं? क्या अपशब्द अब प्रतिरोध की भाषा माने जाने लगे हैं? जेन Z के नाम पर प्रचारित यह भाषा ही क्या आज के समाज की सहज भाषा है? क्या गाली को बेबाकी, निर्भीकता और आधुनिकता का पर्याय समझ लिया गया है? यदि ऐसा है तो यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं, समाज की संवेदना के बदलने का सङ्केत भी है।

लेकिन यहाँ एक भूल करने से ज़रूर बचना चाहिए। हर पीढ़ी अपने से अगली पीढ़ी की भाषा को थोड़ा असभ्य मानती आई है। यह शिकायत नई नहीं है। अतीत से लेकर वर्तमान तक, हर युग में बुज़ुर्गों ने युवाओं की भाषा पर चिन्ता व्यक्त की है। इसलिए केवल यह कह देना कि ‘आज की पीढ़ी बिगड़ गई है’, बहुत सतही निष्कर्ष होगा। असली प्रश्न यह नहीं कि गालियाँ बढ़ रही हैं; असली प्रश्न यह है कि वे बढ़ क्यों रही हैं? कोई भी सामाजिक परिवर्तन बिना कारण के नहीं होता।

जब भाषा में कटुता उतरती है :

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि मनुष्य जब किसी दूसरे व्यक्ति को बराबरी का नहीं, बल्कि प्रतिद्वन्द्वी की तरह देखने लगता है, तो उसकी भाषा सबसे पहले बदलती है। सम्मानसूचक शब्द कम होने लगते हैं और अपमानसूचक शब्द बढ़ने लगते हैं। यही कारण है कि युद्ध के समय सबसे पहले शत्रु को मनुष्य की श्रेणी से नीचे दिखाने की कोशिश की जाती है। उसके लिए ऐसे शब्द गढ़े जाते हैं, जिनसे उसके प्रति घृणा पैदा हो। इतिहास के बड़े-बड़े नरसंहारों का अध्ययन करने वाले समाजशास्त्रियों ने पाया है कि हिंसा से पहले भाषा हिंसक होती है। शब्दों में करुणा घटती है, कटुता बढ़ती है; फिर वही कटुता व्यवहार में उतरने लगती है।

हमारे यहाँ एक पुरानी उक्ति है—वाणी मन का दर्पण है।” आधुनिक विज्ञान भी लगभग यही बात दूसरे शब्दों में कहता है। अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बण्डूरा ने अपने सामाजिक अधिगम सिद्धान्त में बताया कि मनुष्य का बहुत बड़ा व्यवहार अनुकरण से बनता है। बच्चे केवल चलना ही नहीं सीखते, बोलना भी सीखते हैं; और बोलना वे व्याकरण की किताबों से नहीं, अपने आसपास के लोगों से सीखते हैं। जिस घर में सम्मान की भाषा होगी, वहाँ बच्चे सम्मान सीखेंगे। जिस घर में अपमान सामान्य होगा, वहाँ वही भाषा अगली पीढ़ी की ज़बान पर भी चढ़ेगी। घर में पसरी हुई लापरवाही बच्चे के अन्तस् में भी प्रवेश करेगी ही। इसीलिए कहा जाता है कि बच्चे माता-पिता की बातें कम सुनते हैं, उनका व्यवहार अधिक सीखते हैं।

आज इस सीखने की प्रक्रिया में एक नया शिक्षक जुड़ गया है—मोबाइल की स्क्रीन। पहले बच्चा दिन भर में दस-पन्द्रह लोगों की भाषा सुनता था; अब सैकड़ों लोगों की सुनता है। पहले उसका संसार घर, स्कूल और मोहल्ले तक सीमित था; अब पूरी दुनिया उसकी हथेली पर है। यह परिवर्तन अपने-आप में बुरा नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब लोकप्रियता का पैमाना शालीनता नहीं, सनसनी बन जाती है। सोशल मीडिया का अपना मनोविज्ञान है। वहाँ जो बात चौंकाती है, वह अधिक फैलती है। जो उत्तेजित करती है, वह अधिक दिखाई देती है। शान्त भाषा धीरे चलती है, आक्रामक भाषा दौड़ती है। धीरे-धीरे यह भ्रम पैदा हो जाता है कि सबसे अधिक दिखाई देने वाली भाषा ही सबसे सामान्य भाषा है।

गाली का नया संसार :

यहीं से गाली का एक नया समाजशास्त्र शुरू होता है। वह केवल क्रोध की भाषा नहीं रह जाती; कई बार समूह की पहचान बन जाती है। कुछ युवाओं को लगता है कि बिना गाली के बात करना बनावटी है। कुछ के लिए वह ‘बिन्दास’ होने का प्रमाण है। कुछ उसे सत्ता-विरोध का औज़ार मानते हैं। कुछ के लिए वह हास्य का माध्यम है। वेब-सीरीज़, स्टैण्ड-अप कॉमेडी और डिजिटल मनोरञ्जन की दुनिया ने भी कई बार इस धारणा को मज़बूत किया कि जितनी बेधड़क भाषा, उतनी वास्तविक अभिव्यक्ति। परिणाम यह हुआ कि जो शब्द कभी बन्द कमरों तक सीमित थे, वे सार्वजनिक मञ्चों पर भी बिना सङ्कोच सुनाई देने लगे।

लेकिन किसी शब्द का प्रचलित हो जाना इस बात का प्रमाण नहीं कि वह समाज के लिए हितकारी भी है। धूम्रपान भी एक समय आधुनिकता का प्रतीक माना जाता था। बाद में विज्ञान ने बताया कि लोकप्रियता और उपयोगिता दो अलग-अलग बातें हैं। भाषा के साथ भी यही बात लागू होती है। कोई शब्द लाखों बार बोला जाए, तब भी वह सभ्यता का प्रतीक नहीं बन जाता।

दरअसल गाली का सबसे बड़ा सङ्कट यह नहीं कि वह कानों को बुरी लगती है। उसका सबसे बड़ा सङ्कट यह है कि वह मनुष्य के भीतर सम्मान की जगह धीरे-धीरे कम करती जाती है। भाषाविज्ञान में यह माना जाता है कि भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं करती, सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण भी करती है। जब सम्बोधन बदलते हैं, तो सम्बन्ध भी बदलते हैं। पहले लोग असहमति रखते हुए भी कहते थे—”आपकी बात से मैं सहमत नहीं हूँ।” अब कई बार व्यक्ति विचार से नहीं, सीधे व्यक्ति पर आक्रमण करने लगता है। मतभेद धीरे-धीरे मनभेद में बदल जाता है।

भारतीय लोकभाषाओं की सबसे बड़ी शक्ति यही थी कि उन्होंने सम्बन्धों को बचाए रखा। गाँव की दो औरतें झगड़ भी लें, तो थोड़ी देर बाद कोई तीसरा कह देता—”अरे भौजी, अब छोड़ो भी।” बस, एक सम्बोधन तनाव को थोड़ा हल्का कर देता था। एक भाषा लड़ाई का मैदान तैयार करती थी और दूसरी भाषा ज़ेहन में जमी कटुता की बर्फ़ पिघला देती थी। दो किसान खेत की मेड़ पर बहस करते थे, पर बातचीत ‘काका’ और ‘भैया’ से ही शुरू होती थी। रिश्ते भाषा में पहले से मौजूद रहते थे, इसलिए विवाद भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ते थे। जिस स्त्री के लिए सम्बोधन में ‘बहन जी’ मौजूद है, तो उसके लिए ज़बान से ‘साली’ की गाली नहीं निकल सकती। हमारी बोलियों ने केवल शब्द नहीं दिए, सामाजिक तापमान को नियन्त्रित करने का अद्भुत कौशल भी दिया।

विरासत में क्या देंगे? :

यही वह विरासत है, जिसे बचाने की सबसे अधिक आवश्यकता है। आधुनिक होना बुरा नहीं है; आधुनिकता की क़ीमत पर आत्मीयता खो देना दुःखद है। नई पीढ़ी नए शब्द गढ़े, नई अभिव्यक्तियाँ लाए, इसमें किसी को कोई आपत्ति क्योंकर होनी चाहिए! बदलते समय के साथ भाषा भी बदलती है। बदलना ही उसका स्वभाव है, लेकिन हर परिवर्तन प्रगति नहीं होता। यदि नए शब्दों के साथ सम्मान के पुराने शब्द भी बचें, यदि अभिव्यक्ति के साथ मर्यादा भी बचे, यदि प्रतिरोध के साथ शिष्टता भी बनी रहे, तभी भाषा समृद्ध होती है; अन्यथा, वह केवल शोर बनकर रह जाती है।

सभ्यता की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से पहले उसकी ऊँची भाषा से होती है। किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी संसदों में जितना लिखा जाता है, उससे कम उसके घरों में नहीं लिखा जाता। घरों में बच्चे जिस भाषा को सुनते हैं, वही कल समाज की भाषा बनती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि आज की पीढ़ी कैसी भाषा बोल रही है; प्रश्न यह है कि हम उसे कैसी भाषा सौंप रहे हैं। आख़िर आने वाली पीढ़ियाँ हमारी सम्पत्ति से पहले हमारी वाणी की उत्तराधिकारी होंगी। यदि हम उन्हें सम्मान की भाषा देंगे, तो वे सम्मान का समाज बनाएँगी; यदि हम उन्हें अपमान की भाषा देंगे, तो वे अपमान को ही सामान्य मान बैठेंगी। शायद इसी कारण हमारे पुरखों ने कहा था—वाणी केवल मुँह से नहीं निकलती, वह मनुष्य के संस्कारों से निकलती है; और, संस्कारों से बड़ी विरासत किसी समाज के पास कभी नहीं होती। नई पीढ़ी की ज़बान से उसकी भाषा नहीं, समझिए कि उसके संस्कार निकल रहे हैं। (सन्त समीर)

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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