लम्पट, गुण्डा और दङ्गाई : नेहा बोरा की भाषा के निहितार्थ
ऐसा नहीं है कि मार्क्सवाद बेकार की विचारधारा है। मार्क्सवाद में बहुत कुछ काम का है, पर मार्क्सवादी अभी भी अपने उसी पुराने कुएँ में उछल-कूद करके टर्राने का पुरुषार्थ कर रहे हैं और सोचते हैं कि अपने इस शोर से सामने वालों को पुराने दिनों की तरह ही बहरा बनाते रहेंगे। उन्हें नहीं पता कि सामने वालों ने शोर के साथ ‘वेवलेन्थ’ मिलाना सीख लिया है और वे अब अपनी ‘टोन’ शोर से भी ऊँची कर सकते हैं।
किसी ने पूछा कि नेहा बोरा ने जो कहा, उस पर आप क्या कहते हैं। पहले तो मुझे यही सोचना पड़ा कि यह नेहा बोरा कौन है। उन साथी ने दो-चार पङ्क्तियों में बयान किया तो याद आया कि यह वही लड़की है, जो जेन Z वाले आन्दोलन में जन्तर-मन्तर पर उपवास पर बैठी थी। कल ही मैं इस बात पर भी ध्यान से ध्यान दे पाया कि नेहा आइसा की रष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। आप मेरे अज्ञान पर हँस सकते हैं, क्योंकि टीवी और अख़बार पढ़ने की आदत मेरी नहीं है। अक्सर ऐसा होता है कि ख़बरें मुझे तब पता चलती हैं, जब वे लोगों की ज़बान पर कुछ ज़्यादा ही चढ़ चुकी होती हैं और फिर चलते-फिरते कोई मुझे सुना देता है। हाँ, इतनी आदत ज़रूर है कि मैं सुनी-सुनाई किसी ख़बर पर तब तक भरोसा नहीं करता, जब तक कि अपने हिसाब से जाँच-परख न लूँ। इस मामले में भी मैंने उन मित्र से वह वीडियो क्लिप माँगी, जिसमें नेहा बोरा का बयान था।
बोलने वाले के चेहरे के हाव-भाव पर भी ध्यान देने की आदत पड़ गई है, तो यही अन्दाज़ा लगा रहा हूँ कि इस लड़की के व्यवहार में सहजता ग़ायब-सी हो गई है। सहजता न हो तो निष्पक्षता की भी आप उम्मीद नहीं कर सकते। उसके बोलने के ढङ्ग से यही लगा कि वह विचारधारा की बीमारी के चलते सन्निपातग्रस्त है। नफ़रत में आकण्ठ डूबी हुई।
कुछ दिनों पहले चर्चा-कुचर्चा में आए स्वतन्त्र भारद्वाज को नेहा बोरा के साथ खड़ा करें, तो एक स्तर पर दोनों बराबरी करते मिलेंगे। स्वतन्त्र भारद्वाज के स्वभाव में जाहिलियत थी और नेहा बोरा ने अपने काम में जाहिलियत दिखाई। स्वतन्त्र भारद्वाज बड़बोलेपन का शिकार था। कुछ वैसे ही, जैसे कि नया मुल्ला प्याज़ ज़्यादा खाता है। स्वतन्त्र भारद्वाज की प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, भले ही बेहूदा थी। उसके बारे में बात यह सामने आई कि उसे घेरकर हाथापाई की गई तो उसने भी मौक़ा पाते ही अपने ढङ्ग की हरकत की। प्रतिक्रिया में की गई हरकत परिस्थिति और प्रतिक्रिया करने वाले की प्रकृति पर निर्भर है। स्वतन्त्र भारद्वाज को लानत भेजने वाले कह सकते हैं कि मैं उसे कुछ-कुछ बचाने वाला काम कर रहा हूँ, लेकिन बन्धुओ, मैं विचारधारा की किसी बीमारी के हिसाब से निष्कर्ष नहीं निकाल सकता।
नेहा बोरा की हरकत इस मायने में ज़्यादा बुरी है कि उसने निहायत ग़ैरज़िम्मेदाराना बातें बिना किसी बात के बोली हैं। दम की बात तो यह होती कि तर्कों और तथ्यों के आधार पर योगी आदित्यनाथ के कामों को ख़ारिज किया जाता, पर योगी के विरोधी ऐसा कोई दम दिखा नहीं पाते, तो खीझकर लम्पट, गुण्डा और दङ्गाई कहने लगते हैं। नेहा शोध छात्रा होते हुए भी इसलिए जाहिल है कि उसे शायद ‘लम्पट’, ‘गुण्डा’ और ‘दङ्गाई’ जैसे शब्दों का सही अर्थ तक पता नहीं है। इन तीनों शब्दों का सच यह है कि इनमें से दो नेहा बोरा की विचारधारा वालों तथा इनके कुनबे द्वारा जिस तरह के लोगों का साथ लिया जाता है, उन पर ही यदा-कदा (हमेशा नहीं) चरितार्थ होते हैं।
असल में मार्क्सवादी विचारधारा के साथ एक अजीब परेशानी पैदा हो गई है। इधर के कुछ वर्षों में मार्क्सवादियों में तर्कशीलता के बजाय जाहिलियत और लकीर की फ़क़ीरी बढ़ी है। जब मैं प्रयाग विश्वविद्यालय में पढ़ता था तो आइसा, पीएसओ जैसे मार्क्सवादी सङ्गठनों के साथ रहता ही था। एक-से-एक शानदार लोग हुआ करते थे। विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध और ईमानदार युवाओं की अच्छी जमात थी। बदज़बानी के बजाय उनके पास तर्क थे; और, उन तर्कों में एक आकर्षण था। लेकिन यह भी सच है कि समय के साथ नए तर्कों की ज़रूरत पड़ती है, जो नए लोगों ने पैदा नहीं किया। कुछ लोगों या किसी एक समुदाय को दक्षिणपन्थी कहकर ख़ारिज करना पहले के समय में आसान था, क्योंकि दक्षिणपन्थी कहे जाने वाले लोग बहुत जागरूक नहीं थे। वे यह सवाल नहीं करते थे कि दक्षिणपन्थी आख़िर हिन्दू ही क्यों होता है, मुसलमान क्यों नहीं होता। आइसा वग़ैरह के छात्रनेताओं के तर्कों का विद्यार्थी परिषद् वग़ैरह के छात्रनेता आमतौर पर जवाब नहीं दे पाते थे।
गुज़रते समय के साथ अब यह तथाकथित दक्षिणपन्थ बहुत पीछे छूट गया है। हिन्दुओं में तमाम लोग ऐसे सामने आने लगे हैं, जो अपने धर्मग्रन्थों को उलट-पलट कर देखने का अभ्यास कर चुके हैं। ताज़ा उदाहरण है कि जब राहुल गान्धी ने मनुस्मृति के एक श्लोक का ग़लत अँग्रेज़ी अनुवाद पढ़ते हुए कहा कि मनुस्मृति में स्त्रियों को बचपन से लेकर बुढ़ापे तक पुरुषों के अधीन रखा गया है, तो तमाम लोगों ने मनुस्मृति के पन्ने पलटने शुरू किए। असली और मिलावटी मनुस्मृति से लेकर विलियम जोंस तक की बातें होने लगीं। पहले के समय में ऐसी बहसों को प्रगतिशील लोग आराम से दबाने में सफल हो जाते थे। जिस पर आप सवाल कर रहे हों, उसने मनुस्मृति देखी ही न हो और दूसरी ओर विरोध करने के लिए आपने अपने एजेण्डे के हिसाब से चार-छह श्लोकों के उलटे-सीधे अर्थ रट रखे हों, तो स्पष्ट रूप से बहस में आपके चार-छह श्लोक भी भारी पड़ेंगे। इसके अलावा मार्क्सवादियों के पक्ष में एक और बात यह थी कि वैचारिक समूहों और साहित्यिक गतिविधियों पर उनका लगभग क़ब्ज़ा था। लेकिन अब बात आगे बढ़ चुकी है। सोचने लायक़ है कि कुछ लोगों ने तो राहुल गान्धी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उनकी जाहिलियत के चलते तमाम लोगों ने मनुस्मृति ख़रीदी और उसे समझने की कोशिश में मनु के प्रशंसक बन गए।
ऐसा नहीं है कि मार्क्सवाद बेकार की विचारधारा है। मार्क्सवाद में बहुत कुछ काम का है, पर मार्क्सवादी अभी भी अपने उसी पुराने कुएँ में उछल-कूद करके टर्राने का पुरुषार्थ कर रहे हैं और सोचते हैं कि अपने इस शोर से सामने वालों को पुराने दिनों की तरह ही बहरा बनाते रहेंगे। उन्हें नहीं पता कि सामने वालों ने शोर के साथ ‘वेवलेन्थ’ मिलाना सीख लिया है और वे अब अपनी ‘टोन’ शोर से भी ऊँची कर सकते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले की बात है। एक दिन घर जल्दी पहुँच गया तो टीवी खोल ली। शायद ‘आजतक’ चैनल था और जेन Z का मुद्दा ज़ेरे-बहस। एङ्कर ने विद्यार्थी परिषद् और आइसा, दोनों के प्रतिनिधियों को बुला रखा था। मेरा अनुमान था कि आइसा वाले के सामने विद्यार्थी परिषद् वाला छात्र टिक नहीं पाएगा, पर नतीजा उल्टा निकला। आइसा वाला छात्रनेता बात-बात में—मुसोलिनी, हिटलर, फासिस्ट शक्तियाँ—वाले रटे-रटाए जुमलों में ही अपनी बात कह रहा था, जबकि विद्यार्थी परिषद् वाले छात्रनेता ने उम्मीद के विपरीत ज़ोरदार तार्किक बातें कहकर दिल ख़ुश कर दिया।
इसी का नतीज़ा है कि वामपन्थ ने जो दुकान लगाई थी, उस पर अब ख़रीदार नहीं आ रहे हैं। पैकेजिङ्ग तो पुरानी है ही, माल भी पुराना। लोगों को पता लगने लगा है कि यहाँ बासी और मिलावटी माल बिकता है। ऐसा नहीं है कि असली और ताज़े माल की कमी है, पर मिलावटी बेचते-बेचते आदत ख़राब हो गई है। मिलावटी इसलिए बेचना था, क्योंकि मिलावटी जीन वाली एक क़ौम का भी साथ चाहिए था। मार्क्स ने अपने हिसाब से असली माल तैयार किया था। उस असली के सहारे दुनिया के कुछ हिस्सों में एकदम निरापद न सही, पर कुछ बेहतर काम हुए ही, पर भारत में मार्क्स के असली माल में भरपूर मिलावट की गई।
ख़ैर, अब आइए फिर से नेहा नाम की बोरा और स्वतन्त्र नाम के भारद्वाज पर। स्वतन्त्र भारद्वाज तो ख़ैर हवा-हवाई ढङ्ग से बड़े-बड़े नेताओं को अपना बड़ा भाई बताने लगा, पर नेहा बोरा को कुछ बड़े लोगों की सङ्गत घलुए में ही सही, सचमुच मिली है। उसे अपनी समझदारी पर शायद अतिरिक्त भ्रम हो गया है। उसका लहजा गाली-गलौज वाला है। जेन Z के नाम पर ऐसी हरकतों को कुछ लोग जायज़ ठहराने लगे हैं, तो यह अलग बात है। वैसे, यह भी ग़ज़ब है कि हिन्दुस्तान में जेन Z केवल हिन्दुओं में पैदा हुए हैं। एक सज्जन जेन Z पीढ़ी की हरकतों की वकालत करने लगे तो मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने दुनिया के किसी कोने के मुसलमानों की नई पीढ़ी में भी जेन Z की ये वाली विशेषताएँ देखी हैं, तो वे हकलाने लगे। बहरहाल, नेहा बोरा वाला लहजा घोर नफ़रत में डूबे और ख़ुद को तोप समझने वाले किसी अहङ्कारी व्यक्ति का ही हो सकता है। योगी आदित्यनाथ को लम्पट, गुण्डा और दङ्गाई कहना तर्कहीनता की स्थिति से जन्मा एक तरह का मानसिक दिवालियापन है। योगी ने दङ्गे रुकवाए हैं, करवाए नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में गुण्डागर्दी के तन्त्र को भी योगी ने कमज़ोर करने का काम किया है, मज़बूत करने का नहीं। तरीक़े पर कुछ किन्तु-परन्तु तो हो सकते हैं, लेकिन इस मामले में सच्चाई यही है कि योगी की हिम्मत को नफ़रती लोग सह नहीं पाते तो उन्हें गुण्डा और दङ्गाई कहने लगते हैं। सोच सकते हैं कि योगी के लिए लम्पट शब्द के प्रयोग का क्या कोई आधार बनता है?
चलिए, इसी बहाने ‘लम्पट’, ‘गुण्डा’ और ‘दङ्गा’—इन तीनों शब्दों की व्युत्पत्ति भी समझ लेते हैं। ‘लम्पट’ संस्कृत की √रम् धातु से बना है। ‘रम्’ धातु का भाव है—रमना, आसक्त होना, क्रीड़ा करना, मैथुन करना आदि। यहीं से ‘लम्पट’ का अर्थ निकला—किसी विषय में अत्यधिक आसक्त व्यक्ति, विशेषतः कामुक व्यक्ति, व्यभिचारी व्यक्ति। स्वयं सोचकर देखिए कि क्या योगी आदित्यनाथ व्यभिचारी और कामुक व्यक्ति हैं?
‘गुण्डा’ शब्द का सम्बन्ध ‘गण्डक’ और ‘गेण्डा’ से है। गेण्डा भारी-भरकम, उद्दण्ड और प्रहार करने में समर्थ वन्य पशु का रूपक है। आगे चलकर इसके आधार पर उद्दण्ड, बदमाश और उपद्रवी व्यक्ति के लिए ‘गुण्डा’ शब्द प्रचलित हुआ। ‘गुण्डा’ का सम्बन्ध संस्कृत के ‘गोण्ड’, द्राविड़ भाषाओं के ‘गुण्ड’, पश्तो और फ़ारसी शब्द ‘गुन्द’ से भी जोड़ा जाता है। जो भी हो, क्या योगी के हिम्मत-भरे फ़ैसलों के लिए ‘गुण्डा’ शब्द प्रयोग किया जा सकता है? और, ‘दङ्गा’ फ़ारसी के ‘दङ्गल’ से बना है, जिसका सम्बन्ध लड़ाई-झगड़े और भिड़न्त से है। योगी-राज में क्या सचमुच दङ्गे हो रहे हैं या आए दिन होने वाले दङ्गे ख़त्म हो गए हैं? ख़ैर, फुटकर ख़बरें…फुटकर प्रतिक्रिया। अब आप उस मानसिकता की पड़ताल कीजिए, जिसमें मोदी के मुँह से निकले एक तबक़े के लिए ‘दिमाग़ी नक्सल’ और ‘नाराज़ फूफा’ को गलीज़ गाली माना जा रहा है और नेहा बोरा जैसों के मुँह से निकले एक विशेष व्यक्ति के लिए ‘लम्पट’, ‘गुण्डा’ और ‘दङ्गाई’ को अमृत वचन! (सन्त समीर)

