रस से रीत रही भाषा
मुहावरे अकेले कमरे में नहीं बनते। वे चौपालों में बनते हैं। खेतों में बनते हैं। साझे दुःख-सुख में बनते हैं।
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पूरा पढ़ें...अरब की संस्कृति में नारी, स्त्री या महिला एक जननाङ्ग भर है। वैसे ‘जननाङ्ग’ भी नहीं कहना चाहिए, क्योंकि संस्कृत
पूरा पढ़ें...इस्लाम शुरुआत से ही युद्धरत रहा है, तो इसमें धर्म-परिवर्तन के लिए सहमति से आगे बढ़कर मारकूट और छल-छद्म का
पूरा पढ़ें...आज़ादी के बाद जिन मुसलमानों ने मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं के साथ ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हुए पाकिस्तान जाने
पूरा पढ़ें...मूल प्रश्न भरोसे का है। जहाँ भरोसा होता है, वहाँ हिन्दू समुदाय के लोग मुसलमानों के साथ उत्सव मनाने में
पूरा पढ़ें...अपने हिसाब से अपनी नज़र में वे ठीक ही कर रहे थे। उन्हें सिखाया गया था कि इस्लामबहिः लोगों को
पूरा पढ़ें...यदि हम, सृष्टि को जैसा चलना चाहिए, वैसा चलने देने में सहयोगी हैं, इस संसार में अपनी भूमिका कुशलता से
पूरा पढ़ें...आधुनिकता के रङ्ग में रँगी माँएँ बहुत कम मिलेंगी जिन्हें लोरी की दो-चार पङ्क्तियाँ याद होंगी। आज की माँओं को
पूरा पढ़ें...वर्तमान का आचरण लोक-लुभावन हो तो अतीत के ढेर सारे पाप धुल जाते हैं और वर्तमान का आचरण समाज में
पूरा पढ़ें...अजब क़िस्सागोई थी वह। कहानियाँ ख़ास अन्दाज़ और लय में सुनाई जाती थीं। यदि होली का त्योहार आने में एकाध
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