पत्रकारिताविमर्श

1954  का कुम्भ हादसा : खलनायक नेहरू या गोविन्द बल्लभ पन्त

(उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता—दो)

उस ज़माने में जनसञ्चार माध्यमों का विकास बहुत कम था, इसलिए प्रशासन ने पूरी कोशिश यही की थी कि कुम्भ हादसे को किसी बड़े हादसे के रूप में प्रचार न मिल पाए। दुर्घटना के दिन सरकार की ओर से जो प्रेसनोट जारी किया गया, उसमें कहा गया था कि सिर्फ़ कुछ भिखमङ्गे मरे हैं।

सन् 1954 में हुआ इलाहाबाद का कुम्भ हादसा कुम्भ मेलों के इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है, जिसमें कि भगदड़ की वजह से एक हज़ार से ज़्यादा लोग दब-कुचल कर मर गए थे। जिस दौर में सत्ता के प्रति आम अवाम का विश्वास अटूट क़िस्म का था, समाचार पत्र भी पं. नेहरू की सरकार के प्रति सदाशयी भाव रखते थे, उस दौर में कुम्भ हादसे पर जिस तरह से लीक से हटकर प्रदेश के समाचार पत्रों ने पत्रकारिता का उदाहरण प्रस्तुत किया, वह भारतीय पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर है। उस समय स्थानीय प्रशासन से लेकर पं. गोविन्द बल्लभ पन्त तक इस घटना को दबाने की फ़िराक़ थे, ताकि प्रधानमन्त्री नेहरू तक सही जानकारी न पहुँच पाए। बावजूद इसके, घोर असुविधाओं के उस ज़माने में भी इस हादसे की सही जानकारी लोगों तक पहुँचाने में इलाहाबाद से प्रकाशित उस समय के अख़बारों की सराहनीय भूमिका रही।

उस ज़माने में जनसञ्चार माध्यमों का विकास बहुत कम था, इसलिए प्रशासन ने पूरी कोशिश यही की थी कि कुम्भ हादसे को किसी बड़े हादसे के रूप में प्रचार न मिल पाए। दुर्घटना के दिन सरकार की ओर से जो प्रेसनोट जारी किया गया, उसमें कहा गया था कि सिर्फ़ कुछ भिखमङ्गे मरे हैं। लेकिन जब उस समय यहाँ से प्रकाशित होने वाले हिन्दी के ‘अमृत पत्रिका’ व ‘भारत’ तथा अँग्रेज़ी के ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ और ‘लीडर’ जैसे अख़बारों ने सप्रमाण ख़बरें प्रकाशित कीं कि कुम्भ हादसे में हज़ार से ज़्यादा लोग दब-कुचलकर मरे हैं, तो प्रशासन की नींद जैसे उड़ गई। ‘अमृत पत्रिका’ ने कुम्भ हादसे की ख़बर सचित्र छापी थी। इन तस्वीरों की चर्चा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हुई। विदेशी अख़बारों ने ‘अमृत पत्रिका से साभार’ लिखकर इन तस्वीरों को प्रकाशित किया। इन तस्वीरों ने प्रशासन द्वारा सिर्फ़ कुछ भिखमङ्गों के मारे जाने के प्रचार की कलई खोल दी थी, क्योंकि पत्रकारों ने कई ऐसी तस्वीरें अधिकारियों के सामने रखीं, जिनमें साफ़ दिखाई दे रहा था कि दबकर मरने वाली तमाम महिलाओं के गले और हाथ में जेवर थे और वे अच्छे घरों की दिख रही थीं। फोटो जर्नलिस्ट स्व. एन. एन. मुखर्जी ने जान पर खेलकर कुम्भ दुर्घटना की तस्वीरें ली थीं। भगदड़ के समय मुखर्जी घटनास्थल पर ही उपस्थित थे। जब इस हादसे की फोटोग्राफ़ी के लिए वे भीड़ में घुस गए तो उनके पत्रकार साथियों ने प्रेस कार्यालय पहुँचकर यही अन्देशा व्यक्त किया कि सम्भवतः वे भी कुचलकर मारे गए, लेकिन दोपहर बाद जब वे फटेहाल, पर सही-सलामत कैमरे के साथ ‘अमृत पत्रिका’ के कार्यालय में हाज़िर हुए तो सबके आश्चर्य का ठिकाना न रहा और अख़बार के मालिक तरुण कान्ति घोष ने तो ख़ुशी से उन्हें उठा लिया और चिल्ला पड़े—‘‘नेपू ज़िन्दा आ गया।’’ वास्तव में इस घटना से उस समय के पत्रकारों की अपने काम के प्रति दिलचस्पी और प्रतिबद्धता का पता तो चलता ही है, मालिक, सम्पादक और पत्रकारों के बीच के आत्मीय रिश्तों का भी अन्दाज़ा मिलता है।

अख़बारों की सजगता के कारण ही इस हादसे को प्रशासन सामान्य घटना नहीं बना सका। दुर्घटना के दूसरे दिन प्रशासन ने गुपचुप तरीक़े से लाशों के ढेर लगा-लगाकर उन पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी तो ‘अमृत पत्रिका’ के फोटोग्राफ़र ने बड़ी चालाकी से इसकी भी तस्वीरें खींच ली। जब दूसरे दिन शवों को जलाने की तस्वीर पत्रिका में छपी तो प्रशासन को तो मानो साँप सूँघ गया। तत्कालीन मुख्यमन्त्री पं. गोविन्द बल्लभ पन्त तक ग़ुस्से से उबल पड़े और उनके मुँह से निकल पड़ा—‘‘हरामज़ादा फोटोग्राफ़र कहाँ है?’’

ये अख़बार ही थे, जिनकी वजह से पं. जवाहरलाल नेहरू तक सही सूचनाएँ पहुँच पाईं और उन्होंने संवेदना व्यक्त करते हुए कहा—‘‘देश के दूर-दराज़ के हिस्सों से आए लोगों के दुखों को देखकर मेरा हृदय फटा जा रहा है। मैं उन सबके लिए हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूँ।’’ यह उत्तर प्रदेश के अख़बारों की रिपोर्टिङ्ग का ही दबाव था कि कुम्भ हादसे पर आज़ाद भारत में पहली बार ‘कुम्भ इन्क्वायरी कमेटी’ बैठाई गई। इसी के बाद मेले की व्यवस्था के लिए आगामी योजनाएँ भी बनाई जाने लगीं। इस घटना के बाद प्रदेश के समाचार पत्रों में समाचारों को एक अलग तेवर के साथ प्रस्तुत करने की एक विशिष्ट प्रवृत्ति पनपती हुई भी देखी जा सकती है। दबी हुई ख़बरों को बाहर निकालने के लिए ख़तरों से खेलने की साहसिक प्रवृत्ति को इस घटना की रिपोर्टिङ्ग ने बढ़ावा दिया।

इसके बाद के लगभग एक-डेढ़ दशक के समय को उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता की दृष्टि से नेहरूवाद से मोहभङ्ग के तौर पर देखा जा सकता है। आज़ादी के लगभग एक दशक बाद तक नेहरू की पञ्चवर्षीय योजनाओं और औद्योगीकरण की नीतियों में लोग अपने सपनों को पूरा होते देख रहे थे, पर इसके बाद के समय में चीन का आक्रमण, नौकरशाही का विद्रूप और भ्रष्टाचार की छिटफुट घटनाओं ने लोगों में कुछ-कुछ आक्रोश भरना शुरू कर दिया था। नतीजतन, उत्तर प्रदेश के अख़बारों ने भी जनता की आवाज़ को मुखर करना शुरू किया। नेहरू की नीतियों पर पुनर्विचार की ज़रूरत अख़बारों के पन्नों पर दिखाई देने लगी तो राममनोहर लोहिया के सामजवाद का एक नया चेहरा भी उभरने को आतुर दिख रहा था। 1964 में पं. नेहरू का निधन हुआ तो प्रदेश के अख़बार शोक में आकङ्ठ डूबते दिखे, तो इसके बाद बने नए प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री के ‘जय जवान जय किसान’ के नारे में नई सम्भावनाएँ देखी जाने लगीं।

उत्तर प्रदेश के अख़बारों के सरोकारों का यह एक पक्ष है। इसके ठीक एक दशक बाद आपातकाल के समय का एक दूसरा भयभीत चेहरा भी दिखाई देता है। दिलचस्प बात यह ज़रूर है कि आपातकाल में जिस तरह से राष्ट्रीय अख़बार इन्दिरा सरकार के आगे साष्टाङ्ग दण्डवत की मुद्रा में रहे, उसकी तुलना में उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर अख़बारों ने आपातकाल के विरोध का अपना-अपना तरीक़ा अपनाया। बड़े अख़बारों में ‘आज’ की स्थिति यह रही कि इसने आपातकाल का न विरोध किया न समर्थन। हालाँकि ‘समय’ और ‘गाण्डीव’ जैसे अख़बारों ने आपातकाल के विरोध का अपना अलग ही तरीक़ा अपनाया था। जौनपुर से आज़ादी से पहले से (1927) से निकलने वाले अख़बार ‘समय’ ने आपातकाल के दौरान अपना सम्पादकीय स्तम्भ ख़ाली छोड़कर विरोध प्रकट किया था। आपातकाल के बाद इस अख़बार ने एक दिलचस्प सर्वेक्षण यह कराया कि आपातकाल के दौरान ऐसी कौन-कौन सी घटनाएँ हुईं, जिन्हें अख़बारों ने नहीं छापा। अभय प्रताप ने ‘हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास’ पुस्तक में इस अख़बार के सर्वेक्षण से निकली एक साधारण-सी घटना का जिक्र किया है, जिससे यह पता चलता है कि प्रशासन का कैसा दमनकारी रवैया उस दौर में चल रहा था। घटना यह थी कि चाबी बनाने वाले जौनपुर के एक कारीगर को पुलिस ने मीसा में केवल इसलिए बन्द कर दिया था कि उस कारीगर से जब पुलिस ने एक जगह पर जाकर ताले की चाबी बनाने को कहा तो उसने जवाब में बस इतना कह दिया कि पुलिस के लोग तो हमें कहीं जाकर चाबी बनाने से मना करते हैं और ख़ुद ही ऐसा काम करने को कह रहे हैं। बनारस के ‘गाण्डीव’ ने भी आपातकाल का अपने तरीक़े से प्रभावी विरोध किया था। इस अख़बार ने सम्पादकीय स्तम्भ ख़ाली छोड़ने के बजाय पहले पृष्ठ पर सम्पादकीय लिखा और 108 बार ‘श्रीमती इन्दिरा गान्धी जिन्दाबाद’ लिखकर पूरा स्तम्भ भर दिया और नीचे सम्पादक का नाम लिख दिया।

यह जानना रोचक है कि 25-26 जून की रात में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो साथ में अख़बारों पर भी सेंसरशिप लागू कर दी गई और अख़बारों के कार्यालयों पर पहरे बैठा दिए गए। लेकिन पहला दिन होने से प्रशासन की थोड़ी-सी लापरवाही का भी उत्तर प्रदेश के अख़बारों ने भरपूर फ़ायदा उठाया और सेंसरशिप और तमाम तरह के सरकारी प्रतिबन्धों का खुलासा कर दिया। नतीजा यह हुआ कि कई अख़बारों को प्रशासन की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। कानपुर से छपने वाले ‘दैनिक जागरण’ ने अपने 26 जून के अङ्क में सम्पादकीय स्तम्भ वाली जगह को ख़ाली छोड़कर लिख दिया था—‘नया लोकतन्त्र, सेंसरशिप लागू है, कृपया शान्त रहें।‘ परिणाम यह हुआ कि कानपुर में अख़बार के संस्थापक पूर्णचन्द्र गुप्त अपने पुत्र नरेन्द्र मोहन और महेन्द्र मोहन के साथ गिरफ़्तार कर लिए गए। बाद में इस समूह के ही राज्यसभा सांसद रहे गुरुदेव गुप्त की कोशिशों के बाद राज्यपाल के हस्तक्षेप पर ये लोग छूटे और ‘जागरण’ ने भी फूँक-फूँककर क़दम रखने शुरू किए। छोटे अख़बारों पर प्रशासन की निगाह कम पड़ रही थी तो उन्होंने इसका फ़ायदा उठाते हुए अपने तरीक़े से आपातकाल के ख़िलाफ़ माहौल बनाया। आपातकाल को सन्त विनोबा भावे ने ‘अनुशासन पर्व’ कहा तो उत्तर प्रदेश के समाचार पत्रों में इसकी ख़ूब चर्चा हुई। पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों पर विनोबा जी की क़ायदे से लानत-मलामत की गई। उनका अतीत भी खँगाला गया कि पञ्चशील के बाद किस तरह से उन्होंने ‘नेहरू भारत हैं’ कहा था। डॉ. राममनोहर लोहिया का यह बयान भी चर्चा का विषय बना कि—‘आप भारत का इतिहास उठाकर देख लें, सन्तों ने अक्सर कुशासकों की ढाल का काम किया है।’ काँग्रेस अध्यक्ष देवकान्त बरुआ ने जब कहा कि ‘इन्दिरा इज इण्डिया’, तो इसने इस बहस में आग में घी डालने का एक और काम किया।

जाने-माने पत्रकार शम्भुनाथ शुक्ल आपातकाल के दौरान का अपना एक अलग रोचक अनुभव बताते हैं कि वे कानपुर में रहते हुए ‘नया मोर्चा’ नाम से अपना साप्ताहिक अख़बार निकाला करते थे। यह अख़बार कानपुर का जाना-पहचाना नाम बन चुका था। आपातकाल शुरू होते ही उनके साथी भूमिगत हो गए। पूरे 21 महीने तक कौन कहाँ रहा, किसी को कुछ पता नहीं था, पर आपातकाल ख़त्म हुआ और खुली हवा में साँस लेने के लिए लोग बाहर दिखना शुरू हुए तो पता चला कि नई उमर के उनके सभी पत्रकार साथी विवाह के बन्धनों में बँध चुके थे। शम्भुनाथ जी के मुताबिक उस समय पुलिस और नौकरशाहों के पास अथाह शक्ति थी। कोई छोटी-सी बात पर भी विरोध कर दे, तो मीसा लगाकर अन्दर कर दिया जाता था। हालाँकि आम लोगों को इससे कोई मतलब नहीं था। कानपुर जैसी जगह में सब कुछ सामान्य था। तब राशन और चीनी सरकारी दुकानों पर मिलते थे। सभी दुकानें समय पर खुलने लगीं। सरकार के डण्डे की वजह से कालाबाज़ारी पर पूर्ण नियन्त्रण लग गया। गुण्डे-बदमाश सभी भूमिगत हो गए। कुल मिलाकर आपातकाल उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता के लिए भी कठिन समय था और अख़बार सरकार से दो-दो हाथ करने के बजाय बीच का ही रास्ता तलाश कर चल रहे थे। सत्ता प्रतिष्ठान की सेंसरशिप के चलते पूरे देश की तरह उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता का भी हुलिया काफ़ी कुछ बिगड़ चुका था। श्रीमती इन्दिरा गान्धी का आतङ्क सम्पादकों के सिर चढ़कर बोल रहा था। इन सारी स्थितियों के बीच यह ज़रूर कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के छोटे और मझोले समाचार पत्र अपने विरोध को अभिव्यक्ति देने की राह तलाशने में एकदम निराश नहीं हुए थे। (…जारी) (सन्त समीर)

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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