हिन्दुस्तान टाइम्स से जुड़ने की कहानी
उस समय फ़ोन पर स्वामी रामदेव जी से मैंने बस यही कहा—‘‘स्वामी जी, याद रखने के लिए आपका आभारी हूँ, पर मित्रता एक बात है और ज़िन्दगी दूसरी बात। मैं फिलहाल जिस दुनिया में आया हूँ, यहाँ कुछ और अनुभव लेना चाहता हूँ। इसके अलावा, मेरी एक आदत और है कि कोई ज़िम्मेदारी लेने के बाद उसे बीच अधर में छोड़ना पसन्द नहीं करता।’’ स्वामी रामदेव जी ने यह कहते हुए फ़ोन बन्द किया कि ‘मैं फिर बात करूँगा’। इसके बाद हुआ यह कि किसी वजह से मेरी डेस्क से तीन लेख ऐसे निकले, जो स्वामी जी के ख़िलाफ़ थे।
रामबहादुर राय जी के साथ मैंने क़रीब दो साल काम किया। इसी दौरान एक दिन स्वामी रामदेव का फ़ोन आया। क़रीब घण्टे भर उनसे बात हुई। बातचीत में जब उन्हें पता चला कि मैं कहीं नौकरी-जैसा कुछ कर रहा हूँ तो उन्होंने कहा कि अख़बार वाले आपको क्या दे रहे होंगे, आप हरिद्वार आ जाइए। असल में उस समय स्वामी रामदेव आस्था, संस्कार जैसे चैनलों को अपने ज़िम्मे ले रहे थे। अपनी पत्रिका ‘योग सन्देश’ को भी मेरे कुछ सुझावों के बाद कुछ नया रूप दे रहे थे। मेरे पास एक तरह से उनका वह ऑफर था, जहाँ पैसे की कोई कमी नहीं थी और मैं मालिक जैसी हैसियत में काम कर रहा होता। स्वामी रामदेव से अपने रिश्ते कुछ इसी तरह के बनने शुरू हुए थे। यह एक अलग तरह की पत्रकारिता का अनुभव होता, जो मेरे आन्दोलनकारी स्वभाव के ज़्यादा अनुकूल था। मैं उनके यहाँ गया होता तो सम्भवतः मेरे जैसे दस-बीस समाजकर्मी क़िस्म के लोग और पहुँचते। मैदान में उतरकर समाजकर्म का जैसा अपना अनुभव रहा है, वैसे में भरोसा कर सकता हूँ कि हमारे जैसे लोगों के रहते हुए स्वामी रामदेव के सामने ‘रामलीला मैदान-काण्ड’ की नौबत न आती। बहरहाल, उस समय फ़ोन पर स्वामी रामदेव जी से मैंने बस यही कहा—‘‘स्वामी जी, याद रखने के लिए आपका आभारी हूँ, पर मित्रता एक बात है और ज़िन्दगी दूसरी बात। मैं फिलहाल जिस दुनिया में आया हूँ, यहाँ कुछ और अनुभव लेना चाहता हूँ। इसके अलावा, मेरी एक आदत और है कि कोई ज़िम्मेदारी लेने के बाद उसे बीच अधर में छोड़ना पसन्द नहीं करता।’’ स्वामी रामदेव जी ने यह कहते हुए फ़ोन बन्द किया कि ‘मैं फिर बात करूँगा’। इसके बाद हुआ यह कि किसी वजह से मेरी डेस्क से तीन लेख ऐसे निकले, जो स्वामी जी के ख़िलाफ़ थे। इस घटना के बाद सम्भवतः वे ठीकठाक नाराज़ हुए होंगे, क्योंकि फिर कई साल तक उन्होंने कोई खोज-ख़बर नहीं ली। बहुत दिनों बाद कुछ बातें-मुलाक़ातें ज़रूर हुईं, पर वक़्त बदल चुका था।
इस दौरान ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ की केस स्टडी समाप्त करके ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार की केस स्टडी का काम भी पूरा करने में मैं लगा हुआ था। इसके लिए हिन्दुस्तान टाइम्स के रिकॉर्ड रूम का इस्तेमाल करने की ज़रूरत थी, तो मैं ‘हिन्दुस्तान’ के उस समय के सम्पादक प्रमोद जोशी जी से मिला। उनसे यह मेरी पहली मुलाक़ात थी। जब मैंने उन्हें अपना नाम बताया तो उन्होंने कहा—मैं आपको जानता हूँ। यह मेरे लिए ख़ुशी की बात थी। उनका यह उपकार मैं ताउम्र याद रखूँगा कि उन्होंने समूह सम्पादक मृणाल पाण्डे जी से कहकर रिकॉर्ड कीपर की नामौजूदगी में भी मेरे लिए संस्थान का रिकॉर्ड रूम सवेरे सात बजे से लेकर रात नौ बजे तक कभी भी खुलवाने की सुविधा दिलवाई। यह सुविधा न मिलती तो मैं इतनी शानदार केस स्टडी न कर पाता। अपनी सुविधा के हिसाब से कभी सवेरे तो कभी शाम, इस रिकॉर्ड रूम का मैं इस्तेमाल करता रहा। एक दिन लौटते समय जोशी जी से मिलने उनके कमरे में पहुँचा तो उन्होंने बताया कि हिन्दुस्तान टाइम्स का इतिहास लिखवाने की बात चल रही है, इसमें हम आपकी मदद लेना चाहेंगे। गान्धीजी के बेटे देवदास गान्धी की इस संस्थान को खड़ा करने में शुरुआती भूमिका रही थी। इसके अलावा आज़ादी के आन्दोलन की कई ऐतिहासिकताएँ इससे जुड़ी थीं, तो मेरे मन में भी ऐसे संस्थान के साथ जुड़कर काम करने की इच्छा थी ही। मैंने यह बात राय साहब को बताई तो उन्होंने सहमति जताई। कुछ दिनों बाद जोशी जी ने बताया कि कादम्बिनी डिपार्टमेण्ट में मुख्य कॉपी सम्पादक का एक पद इस समय रिक्त है, बाक़ी आप जो कहिए। मैंने कहा कि ठीक है, मेरी तो बस काम में दिलचस्पी है। वैसे पत्रकारिता के भीतर चलने वाली उठापटक और राजनीति के बारे में मुझे कुछ भी अन्दाज़ा रहा होता तो मैं थोड़ी और बेहतर व्यवस्था की बात करता और वे प्रयत्न भी करते ही। हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ़्तर में बैठकर पत्रकारिता करने की बात मेरे मन में बैठ चुकी थी, पर मैंने किसी और डिपॉर्टमेण्ट में इसलिए भी ज़्यादा रुचि नहीं दिखाई, क्योंकि उनके मुँह से कादम्बिनी का नाम सुनते ही इसकी केस स्टडी का विचार भी मेरे मन में तेज़ी से कौंधा।
कुछ दिन बीते तो लगा कि बात आई-गई हो रही है, तो मैंने आते-जाते जोशी जी का एक-दो बार और याद दिलाया। बहरहाल, मेरे ज्वाइन करने की बात तय हो गई। जोशी जी ने कहा कि आपको पैसे वग़ैरह के विषय में एचआर से बात करनी होगी। मैंने कहा कि पैसे वग़ैरह की बात करना मेरे लिए मुश्किल है, क्योंकि यह मुझे अटपटा लगता है। गान्धीवाद का असर कुछ ऐसा था कि मुझे ख़ुद के लिए बहुत ज़्यादा पैसों की ज़रूरत नहीं महसूस होती थी। एचआर के साथ मेरी बातचीत हुई तो मैंने उनसे कहा कि आपको जो ठीक लगे, तय कर लीजिए और मुझे बता दीजिए। इतना कहकर मैं एचटी हाउस से बाहर निकल आया। अति आदर्शवादिता में जीने वाले मेरे जैसे सामाजिक प्राणी को यह बात तब नहीं पता थी कि एचआर का एक काम यह भी है कि वह बरगला कर सामने वाले को कम में राज़ी कर ले। कुछ देर बाद उनका फ़ोन आया। मृणाल पाण्डे जी के बनाए पैकेज से क़रीब दस हज़ार कम करके उन्होंने कहा कि इस समय मार्केट का स्लोडाउन चल रहा है, अगर आप इतने पर मान लें तो हम बाद में कुछ और देख लेंगे। मैंने हँसते हुए कहा कि जब मैंने इनकार जैसी बात ही नहीं की है, तो जैसा आप उचित समझें। ज्वाइन करने के बाद जोशी जी मिले तो बोले कि आपको बात करनी चाहिए थी, ख़ैर आ जाइए, फिर कुछ कर लेंगे। कुछ समय बाद निजाम बदल गया, मैं कादम्बिनी में काम करता रहा और इतिहास-भूगोल लिखने-लिखवाने जैसी कोई बात ही नहीं उठी तो मुझे भी समझ में आया कि मैंने अपनी बेवकूफ़ी से अपनी तनख़्वाह कम करवा ली है। विजय किशोर मानव उस समय कादम्बिनी के सम्पादक थे। संयोगवश एचटी के रिकॉर्ड रूम में काम करते वक़्त एक दिन अचानक यों ही उनसे परिचय हो गया था। जब मेरे कादम्बिनी में आने की बात आई तो मुझे लगता है कि उन्होंने भी मेरा समर्थन करते हुए ख़ुशी-ख़ुशी अपनी सहमति दी थी, क्योंकि एचटी के ज़्यादातर लोगों को यही लग रहा था कि मुझे वहाँ प्रवेश दिलाने वाले मानव जी ही थे। जो भी हो, मानव जी अपने साथ काम करने वालों को थोड़ा हड़काते-गड़काते ज़रूर थे, पर दिल के साफ़ थे, साफ़ बोल देते थे, मन में मैल रखकर नहीं चलते थे।
यहाँ एक बात और याद आ रही है कि उस समय मीडिया में जाति-बिरादरी और क्षेत्रवाद की बहस ज़ोरों पर थी। प्रमोद जोशी और मृणाल पाण्डे पर पहाड़वाद के भी आरोप थे, पर मैंने इसके कोई लक्षण इनमें नहीं देखे। इन दोनों में से कोई भी मेरा पुराना परिचित नहीं था। कोई सोर्स-सिफ़ारिश नहीं, मैं अपने आप में जैसा भी था, ‘वन मैन शो’ था। इनमें से किसी ने मुझसे कभी जाति या क्षेत्र वग़ैरह की कोई बात नहीं की। मेरी जैसी भी क़ाबिलियत थी, उसी का ख़याल कर मुझे जगह दी गई थी। मेरे लिए यह भी बड़ी बात थी कि प्रमोद जोशी जी ने मुझसे स्पष्ट कहा कि आप कहीं बाहर लिखना चाहें तो आप पर कोई पाबन्दी नहीं होगी।
इसके बाद एचटी हाउस के भीतर गुज़रे दस साल अजब-ग़ज़ब अनुभवों से गुज़रे। पहले दिन काम सँभालने से पहले मैंने अच्छे से सोचा-विचारा कि मुझे यहाँ किस तरह रहना है। रामबहादुर राय जी के साथ बात दूसरी थी, पर अब मुझे लगा कि यह नौकरी है, इसलिए मुझे नौकर की तरह ही रहना चाहिए। कुछ दिनों तक मैंने बाक़ायदा इस बात का अभ्यास किया कि सङ्कोच के साथ काम कैसे किया जाता है। सङ्कोच के साथ काम करने के क्या नफ़ा-नुकसान हुए, इसे याद करूँगा तो ज़िन्दगी का एक दूसरा सिरा खुलेगा। फिर कभी… अन्त में बस यही कहूँगा कि बुराइयाँ तो हैं, पर भले लोगों की भी कमी नहीं है। 28 अगस्त, 2020 को इस्तीफ़ा सौंपकर एचटी हाउस की सीढ़ियों पर खड़े-खड़े फेसबुक पोस्ट किया, तो नीचे उतरते-उतरते फ़ोन आने शुरू हो गए। ऐसे लोगों के भी फ़ोन आए कि लगा कि दुनिया में देवता अभी निवास करते हैं। जो हुआ, शायद कुछ और अच्छे के लिए हुआ हो। (6 सितम्बर, 2021, फेसबुक)

