जहाँ अकबर ने आराम फ़रमाया
महान् स्वतन्त्रता सेनानी और समाजवाद के प्रतिबद्ध वक्ता डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च, 1910 को इसी अकबरपुर क़स्बे में हुआ था। अलबत्ता, उनका जैसा स्मारक यहाँ होना चाहिए था, वैसा कुछ दिखाई नहीं देता। दिलचस्प है कि लोहिया जी की जन्मस्थली से चन्द मीटर की दूरी पर ही भारतीय भाषाओं के विशालतम उपन्यास ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के रचयिता पद्मश्री मनु शर्मा भी जन्मे थे। प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी और गान्धीवादी जेबी कृपलानी द्वारा स्थापित उत्तर प्रदेश के सबसे प्रमुख खादी आश्रमों में से एक ‘श्री गान्धी आश्रम’ यहाँ आज भी है, पर अब इसकी भी आभा कुछ धुँधलाती-सी दिखती है।
समय का पहिया कहाँ थमता है! गुज़रते वक़्त के साथ कहीं बस्तियाँ वीरान हो जाती हैं तो कहीं वीराने बस जाते हैं। पाँच सौ साल से बस ज़रा-सा पहले का वाक़या है। अयोध्या नगरी से कुछ दूर अवध के एक छोटे-से हिस्से में व्यापे घनघोर जङ्गल में एक दिन कुछ हलचल होती है, एक बस्ती के बीज पड़ते हैं; उगना शुरू होती है किसी नन्हे पौधे की तरह और समय के साथ भरे-पूरे वृक्ष में बदल जाती है।
सोलहवीं सदी के छठे दशक तक का बियाबान आज अकबरपुर के रूप में आबाद है। दो दशक पहले इसके साथ अम्बेडकर नगर नाम ज़रूर चस्पाँ हुआ, पर अकबरपुर अब भी अकबरपुर है और अपने बसने की कहानी अपने नाम से बयान करता है। कहते हैं, सन् 1566 में सम्राट अकबर लाव-लश्कर के साथ यहाँ से गुज़रे। कुछ दिनों विश्राम किया तो ख़याल आया कि क्यों न यहाँ एक बस्ती बसाई जाए। सम्राट् ने आज के तहसील तिराहे वाली जिस जगह पर आराम फ़रमाया, वहाँ नमाज़ के लिए एक मस्ज़िद की आधारशिला रखी। बादशाह के नाम पर बस्ती बनी अकबरपुर और मस्ज़िद का नाम आमजन ने दिया क़िले वाली मस्ज़िद।
अकबरपुर बसा तो इसके इर्दगिर्द चालीस-पचास किलोमीटर के दायरे में बाद के दिनों में मुग़लिया निशान गहराते चले गए। पाँच सदियों में बहुत कुछ बना-बिगड़ा-बसा। मुग़ल काल का असर और उसके पहले के अवध का गौरवशाली ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अतीत इसे एक मिलाजुला सांस्कृतिक परिधान देते हैं। जिस गङ्गा-जमुनी तहज़ीब की हम बात करते हैं, वह देश में और कहीं कितनी जीवित है, पता नहीं, पर यहाँ के लोगों के व्यवहार में इसे कुछ हद तक देखा जा सकता है। ऐसा नहीं कि समय का बदलाव यहाँ नहीं है, या कि नफ़रती झञ्झावातों, आँधियों का असर नहीं होता, फिर भी अकबरपुर के इर्दगिर्द मुस्लिम बहुल बस्तियों की बड़ी सङ्ख्या के बावजूद आज भी दङ्गे-फ़साद की वैसी गम्भीर स्थितियाँ नहीं बनतीं, जैसी कि देश के कई और हिस्सों में दिखाई दे जाती हैं। लगभग तीन दशक पहले यहाँ टाण्डा में कुछ लोगों के उकसावे पर हल्की-सी दङ्गे की स्थिति बनती दिखाई दी थी, पर इसके बाद से अब तक शान्ति है।
बसाहट भी अजब है। क़स्बाई आबादी में हर सुबह अजान का स्वर, तो गाँवों में हर कहीं हिन्दुओं का राम-राम, जै सीताराम सुनाई देता है। दुआ-सलाम में मुसलमानों के मुँह से भी अक्सर राम-राम निकल ही आता है। न हिन्दू मुसलमानों को छेड़ते हैं और न मुसलमान हिन्दुओं को। ऐसा नहीं है कि सामाजिक समरसता के लिए कोई आन्दोलन चला हो, बस सदियों में विकसित हुई आपसदारी का प्रतिफल है।
महाभारत काल का खण्डहर हो चुका राजा मोरध्वज का क़िला बस अवशेष भर है, पर यहाँ से गुज़रिए तो कल्पना जैसे अतीत की गहराइयों में उतर ही जाती है। यह सरयू तट के कम्हरिया घाट पर है। पास में ही चाण्डी घाट है। अकबरपुर-अम्बेडकर नगर और गोरखपुर का यह सन्धि स्थल है। और बस उस पार आज़मगढ़। ख़ूबसूरत स्थान है, पर ख़तरनाक भी। यायावरी थोड़ी सँभलकर करनी होती है। पाँच हज़ार साल पुराना इतिहास है तो यहाँ के टीलों और गुफाओं में इतिहास का बहुत कुछ दफ़्न है। इन गुफाओं में सन् 1857 के क्रान्तिकारी छिपकर रहा करते थे। नदी के बहाव में बहुत कुछ बह चुका है, पर बिना देखरेख के जो बचा है उसे देखने लोग आते रहते हैं। नदी किनारे क़िला था, तो आज भी जब-तब किसी मटके वग़ैरह में दबा पड़ा कुछ माल-असबाब किसी-किसी के हाथ लग जाता है। राजा मोरध्वज की वंशावली अभी सुरक्षित है।
अकबरपुर तमसा के तट पर है। कुछ ही किलोमीटर दूर घाघरा यानी सरयू की कलकल भी सुनाई देती है। मझुई और टोण्डी जैसी छोटी नदियाँ भी यहाँ की मिट्टी को उपजाऊ बनाने में अपना योगदान देती हैं। तमसा को पार करने का कोई साधन नहीं था तो सम्राट् अकबर ने लकड़ी का एक पुल बनवाया। इसे काफ़ी समय तक शाही पुल कहा जाता रहा। आज यह नया रूप ले चुका है और अकबरपुर से शहज़ादपुर को जोड़ने का एकमात्र ज़रिया है। इतिहास खँगालने पर पता चलता है कि शाही पुल बना तो अकबर के निर्देश पर ही नदी पार शहज़ादपुर बस्ती बसाई गई और क़रीब पच्चीस किलोमीटर दूर तमसा के ही तट पर जलालपुर, जो बादशाह के उपनाम पर है। श्रीमद्भगवद्गीता के उर्दू रूपान्तरकार प्रसिद्ध शायर अनवर जलालपुरी का जन्मस्थान यही जलालपुर है।
अकबरपुर पहले तहसील के रूप में फ़ैज़ाबाद ज़िले का हिस्सा था। 29 सितम्बर, 1995 को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमन्त्री मायावती ने इस क्षेत्र को फ़ैज़ाबाद से अलग करके ज़िला घोषित किया और नाम दिया अम्बेडकर नगर। ज़िले का बस नाम है, बाक़ी मुख्यालय या कहे सब कुछ अकबरपुर है। इस तरह अकबरपुर के साथ अम्बेडकर नगर चस्पाँ हुआ तो हम इसे अकबरपुर-अम्बेडकर नगर कह सकते हैं।
शहरी आबादी को छोड़ दें तो अकबरपुर-अम्बेडकर नगर के लोग सदियों से मुख्य रूप से खेतीबाड़ी में रमे रहे हैं। ज़मीन उपजाऊ है तो शायद ही कोई अनाज हो जो यहाँ की धरती पैदा न कर सके। जिनकी कम ज़मीनें थीं, वे भी आराम से गुज़र-बसर कर सकते थे। शायद इसीलिए यहाँ के लोगों की मानसिकता भी कुछ ऐसी बनती गई कि राजे-महाराजे आते-जाते रहे, पर आमजन ने बस अपने काम से काम रखा। तुलसी की चौपाई ‘कोउ नृप होय हमैं का हानी…’ यहाँ के जन सामान्य पर अच्छी तरह चरितार्थ होती है। इसका मतलब यह नहीं समझना चाहिए कि यहाँ के लोग अपनी दाल-रोटी के स्वार्थ तक सीमित रहने वाले लोग रहे हैं। स्वतन्त्रता सङ्ग्राम की लहर चली तो यहाँ की धरती ने भी आज़ादी के कई दीवाने पैदा किए। 1857 के महान् क्रान्तिकारी मङ्गल पाण्डे तक के बारे में इतिहास के कुछ जानकारों का मत है कि उनका जन्म भी 19 जुलाई 1827 को अकबरपुर के सुरहुरपुर में हुआ था और बलिया वे बाद में गए।
कुछ दशक पहले तक नौकरी करना यहाँ के लोगों के लिए अच्छा काम नहीं था। यह बात अलग है कि नए ज़माने ने खेती के छोटे रक़बे को फ़ायदे का काम नहीं रहने दिया तो यहाँ के युवाओं के लिए भी नौकरी धीरे-धीरे पहली पसन्द बनती चली गई। दिलचस्प है कि किसी दौर में कामचलाऊ पढ़ाई से आगे की सोच न रखने वाले इस क्षेत्र के युवाओं ने नए दौर की नौकरियों में भी शिक्षा क्षेत्र को ख़ास तौर से चुना है। उदाहरण के लिए यहाँ के छोटे गाँवों में जलालपुर के पास का एक गाँव है भगवानपुर। कुछ दशक पहले यहाँ नौकरी में दिलचस्पी रखने वाला कोई नहीं था, पर अब शायद ही कोई घर होगा, जिसमें एक-दो शिक्षक न हों।
ख़ैर, यहाँ का खेतिहर समाज अपनी परम्पराओं को सँजोकर तो रखता है, पर अपने अतीत को याद रखने की बहुत चिन्ता शायद नहीं करता, अन्यथा यहाँ की धरती पर कुछ भग्नावशेष तो हैं, जो पौराणिक काल से लेकर स्वतन्त्रता सङ्ग्राम तक के इतिहास का बहुत कुछ बयान करते दिखाई देते हैं। यहाँ आप महलों, इमारतों का वैभव देश के अन्य हिस्सों की तरह साफ़-साफ़ शायद देख नहीं पाएँगे, पर यत्र-तत्र के भग्नावशेषों में अतीत के फड़फड़ाते कुछ ज़रूरी पन्नों की इबारतें ज़रूर महसूस कर पाएँगे।
प्रयागराज ही नहीं, एक सङ्गम अकबरपुर-अम्बेडकर नगर में भी है। अकबरपुर मुख्यालय से क़रीब दस-ग्यारह किलोमीटर की दूरी पर यह तमसा और बिछुई नदी का सङ्गम है। इसे श्रवण क्षेत्र कहा जाता है। पौराणिक कथा है कि मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार जब तीर्थयात्रा करते हुए यहाँ से गुज़रे तो इसी सङ्गम तट पर अपने अन्धे माता-पिता के लिए पानी लेने गए थे और राजा दशरथ का शब्दवेधी बाण लगने से मृत्यु को प्राप्त हुए। श्रवण कुमार की याद में सदियों से यहाँ माघ महीने की पूर्णिमा को एक बड़ा मेला लगता है।
अकबरपुर से पूरब की तरफ़ रुख़ करेंगे तो कुछ दूरी पर मिलेगा किछौछा शरीफ़। ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और निज़ामुद्दीन औलिया के बाद भारत के तीसरे सबसे प्रभावशाली सूफ़ी सन्त हज़रत मख़दूम अशरफ़ सिमनानी (सन् 1286-1387) की प्रसिद्ध दरगाह यहाँ है। सङ्गमरमरी पत्थरों से सजी तालाब से घिरी इस दरगाह पर मुसलमानों के साथ हिन्दू, सिख, ईसाई समेत विभिन्न धर्मों के श्रद्धालु भी बड़ी सङ्ख्या में पहुँचते हैं। इतिहास यह है कि हज़रत मख़दूम ईरान के बादशाह थे। बादशाही में मन नहीं लगा तो लोगों की भलाई के लिए राजपाट छोड़ निकल पड़े। भारत पहुँचे तो अकबरपुर के पास किछौछा उन्हें ऐसा भाया कि यहीं बस गए।
किछौछा से दक्षिण-पूर्व की ओर क़रीब तेरह-चौदह किलोमीटर की दूरी तय करने पर अकबरपुर-अम्बेडकर नगर का सबसे प्रसिद्ध मेला स्थल मिलेगा गोविन्द साहब, जिसे सन्त गोविन्द साहब की तपोभूमि के रूप में जाना जाता है। इस मेले की चहल-पहल पूरे एक महीने तक रहती है। लोग खिचड़ी और लाल गन्ना चढ़ाने आते हैं। ये ही दो चीज़ें गोविन्द साहब की विशेष पसन्द थीं। इतिहास के कुछ किन्तु-परन्तु तो हैं, पर कहा यही जाता है कि लगभग चार सौ साल पहले सन् 1709 में अगहन माह के शुक्ल पक्ष के दशमी के दिन गोविन्द साहब का जन्म जलालपुर के नगपुर गाँव में हुआ था। इसी नाते अवध के इस इलाक़े में इस दिन को गोविन्द दशमी कहा जाता है और मेला इसी दिन से शुरू होता है। लोग मानते हैं कि गोविन्द दशमी के दिन यहाँ खिचड़ी चढ़ाने से मन की मुराद पूरी होती है। मेले की एक ख़ासियत यह भी है कि कोई श्रद्धालु वापसी में अगर खजला (खाजा) न ले जाए तो उसका यहाँ आना अधूरा ही समझा जाता है। रोचक है कि यहीं नगपुर जलालपुर में भक्तिकाल के निर्गुण सन्त बाबा पलटूदास भी संवत् 1780 के आसपास पैदा हुए। बाबा पलटूदास को ज़िन्दा जला दिए जाने की घटना पूरे भक्ति आन्दोलन में अपने तरह की अकेली है, तो अकबरपुर-अम्बेडकर के अतीत पर एक धब्बे-जैसी।
कोई यायावर अकबरपुर-अम्बेडकर नगर का रुख़ करे तो हँसवर-मकरही की रहस्यमय भुतही हवेली से भी मुख़ातिब हुए बिना भला कैसे रह सकता है! कभी की आबाद यह शानदार हवेली आज वीरान है। इस हवेली के आसपास लोग रात में जाने से डरते हैं। वास्तु का यह सुन्दर नमूना है, पर धीरे-धीरे जर्जर हो रही है। इसके बारे में आम जन में प्रामाणिक स्मृतियाँ कम किंवदन्तियाँ ज़्यादा हैं। अँग्रेज़ों के जो दस्तावेज़ उपलब्ध होते हैं, उनके हिसाब से इस हवेली का इतिहास लगभग दो सौ साल पीछे से शुरू होता है। छोटी-सी कोठी बड़ी-सी हवेली के रूप में सन् 1937 में बदलना शुरू हुई, पर इससे जुड़े राज परिवार का अतीत अकबरपुर-अम्बेडकर नगर के इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है।
सन् 1526 से 1530 के चार साल के शासन में जब बाबर के सेनापति मीरबाँकी ने अयोध्या के राममन्दिर को ध्वस्त करके वहाँ मस्ज़िद का निर्माण शुरू कराया तो हँसवर के राजा रणविजय सिंह ही थे, जिन्होंने राममन्दिर को बचाने के लिए पूरी ताक़त से युद्ध किया। वे वीरगति को प्राप्त हुए तो उनके बाद उनकी पत्नी जयराज कुमारी ने तीन हज़ार महिलाओं के साथ रामजन्म भूमि को बचाने के लिए आक्रमण किया। महारानी के जज़्बे को देखते हुए बड़ी सङ्ख्या में साधु-सन्तों ने भी सहयोग किया। इस बीच बाबर की मृत्यु हुई तो महारानी ने बिना मौक़ा गँवाए रामजन्म भूमि पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद बादशाह हुमायूँ की स्थिति बेहतर हुई तो उसने पूरी ताक़त से उलटवार किया और महारानी वीरगति को प्राप्त हुईं। इस राज परिवार की बाद की पीढ़ियों ने भी राममन्दिर के लिए सङ्घर्ष जारी रखा।
अँग्रेज़ों का शासन शुरू हुआ तो इस राजशाही को दो हिस्सों में बाँट दिया गया। ठकुराइन चन्द्रभल कुँवर के हिस्से में मकरही आई तो उनके पुत्र कमला प्रसाद सिंह ने छोटी कोठी को शानदार हवेली का रूप देना शुरू किया। बाद के दिनों में इनके वंशजों में विवाद शुरू हुए तो यहाँ के लोग लखनऊ जाकर बस गए। इस तरह आबाद हवेली पूरी तरह वीरान हो गई और रहस्यात्मक भुतही हवेली के तौर पर मशहूर होने लगी।
अकबरपुर-अम्बेडकर नगर की एक महत्त्वपूर्ण बस्ती है जलालपुर। शायर अनवर जलालपुरी के नाते इसे ख़ास पहचान मिली है, पर यहाँ के लाल गमछों ने मुम्बई पहुँचकर फ़िल्मी दुनिया में अपनी मौजूदगी और भी पहले से दर्ज कराई हुई है। मुग़ल सम्राट् अकबर ने बसाया तो ज़ाहिर है जलालपुर की काफ़ी बड़ी आबादी मुसलमानों की है; हिन्दू भी हैं ही, लेकिन आम तौर पर मिलजुलकर ही रहते आए हैं। समरसता कुछ ऐसी कि कुछ दशक पहले यहाँ की सबसे बड़ी मस्ज़िद बनना शुरू हुई तो तमाम हिन्दुओं ने भी दान-चन्दा दिया। आज का जलालपुर एक महत्त्वपूर्ण बाज़ार है। सस्ते कपड़ों की चाह में दूर-दूर से ग्राहक यहाँ आते हैं। कह सकते हैं कि यहाँ की रातें सोने के लिए नहीं, बल्कि हैण्डलूम की धुनों पर थिरकने के लिए हैं। यहाँ से उत्तर की ओर चलें और बसखारी पार करें तो टेरीकॉट कपड़ों के लिए मशहूर घाघरा किनारे टाण्डा मिलेगा। टाण्डा को इसलिए भी जाना जाता है कि यहाँ एनटीपीसी की देश की एक महत्त्वपूर्ण ताप विद्युत परियोजना है।
अकबरपुर-अम्बेडकर नगर को प्रकृति ने काफ़ी कुछ दिया है, भले ही चीज़ें सरकारी उपेक्षा की शिकार रही हों। यहाँ देवहर झील, गड़हा झील हैं, तो एक काफ़ी बड़ी दरबन झील भी है, पर उपेक्षा की शिकार। जलालपुर के नज़दीकी भगवानपुर और कैथा-डड़वा गाँव के पास एक ‘कैथा ताल’ हुआ करता था, जिसका व्यास ही एक किलोमीटर से ज़्यादा का था, पर अब नाममात्र का बचा है। एक नाला बनाकर इसे नदी से जोड़ दिया गया और इसकी ज़मीन को पट्टा दे-देकर बाँट दिया गया। शासन-प्रशासन का ध्यान रहा होता तो इसे देश का महत्त्वपूर्ण पक्षी विहार और पर्यटन स्थल बनाया जा सकता था। सारस का एक जोड़ा आज भी जैसे मरते हुए इस तालाब का शोकगीत सुनाने के लिए दिखाई दे जाता है।
अकबरपुर की मुख्य आबादी की ओर एक बार फिर लौटें तो हल्की-सी याद उभरती है कि महान् स्वतन्त्रता सेनानी और समाजवाद के प्रतिबद्ध वक्ता डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च, 1910 को इसी अकबरपुर क़स्बे में हुआ था। अलबत्ता, उनका जैसा स्मारक यहाँ होना चाहिए था, वैसा कुछ दिखाई नहीं देता। दिलचस्प है कि लोहिया जी की जन्मस्थली से चन्द मीटर की दूरी पर ही भारतीय भाषाओं के विशालतम उपन्यास ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के रचयिता पद्मश्री मनु शर्मा भी जन्मे थे। प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी और गान्धीवादी जेबी कृपलानी द्वारा स्थापित उत्तर प्रदेश के सबसे प्रमुख खादी आश्रमों में से एक ‘श्री गान्धी आश्रम’ यहाँ आज भी है, पर अब इसकी भी आभा कुछ धुँधलाती-सी दिखती है। इधर की पीढ़ी में राष्ट्रीय स्तर की बॉलीवाल खिलाड़ी और एवरेस्ट फ़तह करने वाली पहली भारतीय विकलाङ्ग महिला पद्मश्री अरुणिमा सिन्हा का जन्म भी 20 जुलाई, 1989 को यहीं हुआ था।
यों, मिझौड़ा के जङ्गल से निकलें, शिवबाबा और गाज़ी मियाँ के लहबड़वा की परम्परा तक पर निगाह डालते हुए कालक्रम में 1947 के मुहाने पर पहुँचें तो पुराण काल से लेकर मुग़ल काल और ब्रिटिश काल तक अकबरपुर-अम्बेडकर नगर में और भी बहुत कुछ दिखाई देगा, पर हमारे रहनुमाओं ने इधर ध्यान नहीं दिया, तो यहाँ के इतिहास ने भी जैसे नीरवता की चादर ओढ़ ली। कोई धुन का धनी खोजबीन में लगे तो शायद भूले-बिसरे अतीत के कुछ और हिस्से उभर आएँ। बाबा पलटूदास की बानी में कुछ वही बात कि—आसिक का घर दूर है, पहुँचे बिरला कोय। पहुँचे बिरला कोय होय जो पूरा जोगी।। (सन्त समीर)
(दैनिक भास्कर की पत्रिका ‘अहा ज़िन्दगी’ के नवम्बर, 2024 अङ्क में प्रकाशित)

