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‘ईश्वर-अल्ला तेरो नाम’ का सच!

आज़ादी के बाद जिन मुसलमानों ने मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं के साथ ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हुए पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था, उन्हें इस देश के नेताओं ने मुख्य धारा में ठीक से घुलने-मिलने ही नहीं दिया। पं. नेहरू को तुष्टीकरण का यह अपराध करते हुए डॉ. राममनोहर लोहिया ने सबसे पहले पहचाना था और लगभग डाँटते हुए समझाया था, पर काँग्रेस को तो एक रास्ता दिख रहा था कि मुसलमानों को ग़रीब और मूर्ख बनाए रखो तो सत्ता की राह आसान बनी रहेगी।

गङ्गा-जमनी तहज़ीब का नारा लगाने के लिए क्या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी ज़रूरी है? मौत हिन्दू की हो या मुसलमान की, पीड़ा तो बराबर होती है, लेकिन गङ्गा-जमनी तहज़ीब का जयकारा लगाने वाले एक तबक़े को क्यों लगता है कि निर्दोष हिन्दू कितने भी मार दिए जाएँ तो कोई बात नहीं, पर मुसलमानों में से एक-दो को भी खरोंच आ जाए तो गङ्गा-जमनी तहज़ीब के लिए ख़तरे की बात है? प्रगतिशीलता की महान् पत्रकारिता करने वाले कुछ लोगों को बीते कुछ दिनों से ही देख रहा हूँ कि हाईकोर्ट ने ज़रा-सा मौक़ा क्या दिया कि ये लोग स्वामी रामदेव को लताड़ने वाले बेसिर-पैर के विमर्श आयोजित करने लग गए हैं, पर धर्म पूछ-पूछकर 28 लोगों की हत्या कर दिए जाने पर बात करना इन्हें ज़रूरी नहीं लग रहा।

अक्सर कहा जाता है कि क्या आतङ्क का भी कोई धर्म होता है, लेकिन उल्टा सवाल है कि क्या यह धार्मिक आतङ्क नहीं है। जो लोग क़ुरान की लोककल्याणकारी व्याख्या कर लेते हैं, वे वन्दनीय हैं, पर यह आतङ्क तो वास्तव में इस्लामजनित है, इसलिए विशुद्ध रूप से मज़हबी है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश के बहुत कम मुसलमानों को यह बात समझ में आती है कि कुछ लोगों ने आज़ादी के बाद से ही गङ्गा-जमनी तहज़ीब का नारा लगवा-लगवाकर उन्हें राजनीति की मशीनरी में ‘टूल’ की तरह फ़िट करने का काम किया है, बस। आज़ादी के बाद जिन मुसलमानों ने मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं के साथ ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हुए पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था, उन्हें इस देश के नेताओं ने मुख्य धारा में ठीक से घुलने-मिलने ही नहीं दिया। पं. नेहरू को तुष्टीकरण का यह अपराध करते हुए डॉ. राममनोहर लोहिया ने सबसे पहले पहचाना था और लगभग डाँटते हुए समझाया था, पर काँग्रेस को तो एक रास्ता दिख रहा था कि मुसलमानों को ग़रीब और मूर्ख बनाए रखो तो सत्ता की राह आसान बनी रहेगी। हम कब समझेंगे? नहीं समझेंगे तो कुछ दशकों बाद ही सही, देश के एक और बँटवारे के लिए तैयार रहना होगा। मैं गान्धीवादी रहा हूँ, पर मुझे यह कहने में हिचक नहीं कि गङ्गा-जमनी तहज़ीब के नाटक में गान्धीवादियों की बड़ी भूमिका रही है। कमाल है, जिन्ना से लेकर आज का पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर तक चिल्ला-चिल्लाकर कहता है कि मुसलमानों का सब कुछ हिन्दुओं से अलग है, ये दोनों मिलकर एक राष्ट्र हो ही नहीं सकते, पर हम हैं कि फिर भी ग़फ़लत में बने रहना चाहते हैं। हिन्दू-मुसलमान ‘ईश्वर-अल्ला तेरो नाम’ रट-रटकर नहीं, बल्कि अपनी-अपनी सच्चाई अच्छी तरह समझ कर ज़्यादा अच्छे से एक साथ रह सकते हैं। (सन्त समीर)

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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