यह जूता समझदार ने उछाला है
सही कहूँ तो दो-तीन साल पहले जब से मेरा ध्यान जस्टिस गवई पर गया है, तब से ही मुझे उनका तौर-तरीक़ा कई बार आग्रही लगा है। डॉ. अम्बेडकर के चलते जो लोग नए क़िस्म के बौद्ध बने हैं, उन सबमें में से ज़्यादातर का हाल ऐसा ही है। प्रतिक्रिया में ही सही, पर अम्बेडकर साहब ने बहुत सोचने-विचारने के बाद फ़ैसले लिए थे, लेकिन उनके अनुयायियों को यह तक नहीं पता कि बौद्ध धर्म वास्तव में है क्या; या कि वे कौन-से बौद्ध बन रहे हैं।
जस्टिस गवई पर जूता उछालने की घटना पर मैंने लिखा था—“जस्टिस गवई का बयान मेरी नज़र में अगर बद-तमीज़ी है, तो उन पर जूता उछालने का काम बद-तमीज़ी से बहुत आगे की बेहूदगी है।”
इस बयान पर अभी क़ायम हूँ, पर अब मुझे जूता उछालने वाले वकील से सहानुभूति हो रही है।
असल में जब भी जूता उछालने या स्याही फेंकने की कोई घटना होती है, तो अधिकतर मामलों में ऐसी हरकत करने वाला मानसिक विक्षिप्त या कुछ हल्के दिमाग़ वाला मिलता है, पर जस्टिस गवई वाले मामले में मुझे बार-बार लग रहा था कि जूता फेंकने वाला व्यक्ति हल्के दिमाग़ का तो नहीं होना चाहिए। इसी नाते अख़बारों की ख़बरों के आधार पर फेसबुक पर पोस्ट तो मैंने लिख दी, पर लिखने के बाद जूता उछालने वाले वकील को सुनना भी ज़रूरी लगा। सुनने के बाद सचमुच लगा कि इस व्यक्ति का मक़सद जूता मारना नहीं, बल्कि बस जूता उछालना ही था। उसकी मनोभावना को मैं स्वाभाविक मानता हूँ। आप बड़े-बड़े समझदारों के बीच बैठकर उनकी बातें सुनिए तो पता चलेगा कि जूता उछालने वाला वकील तमाम समझदारों से बहुत बेहतर दिखाई देगा। वकील का यह कहना ज़रूर मूर्खतापूर्ण लग सकता है कि जैसे उसे नींद में भी भगवान् कह रहे हों कि देश जल रहा है और तुम सो रहे हो…उठो कुछ करो। असल में यह मस्तिष्क के काम करने का एक तरीक़ा है। किसी चीज़ पर आपका ध्यान बड़ी गहनता के टिक जाता है तो आपको कुछ अलग तरह के एहसास होने लगते हैं, जिन्हें हम ‘इल्यूज़न’ कहते हैं। कई बार ‘इल्यूज़न’ से आगे निकल कर ये यह एकदम सटीक और सच भी हो सकते हैं। इलहाम टाइप की चीज़ों की व्याख्या भी आप इसी तरह से कर सकते हैं।
जो भी हो, वकील मुझे सच्चा इनसान लगा। वह हिंसक व्यक्ति नहीं है। उसके सारे तर्क विचार करने लायक़ हैं।
सही कहूँ तो दो-तीन साल पहले जब से मेरा ध्यान जस्टिस गवई पर गया है, तब से ही मुझे उनका तौर-तरीक़ा कई बार आग्रही लगा है। डॉ. अम्बेडकर के चलते जो लोग नए क़िस्म के बौद्ध बने हैं, उन सबमें में से ज़्यादातर का हाल ऐसा ही है। प्रतिक्रिया में ही सही, पर अम्बेडकर साहब ने बहुत सोचने-विचारने के बाद फ़ैसले लिए थे, लेकिन उनके अनुयायियों को यह तक नहीं पता कि बौद्ध धर्म वास्तव में है क्या; या कि वे कौन-से बौद्ध बन रहे हैं। असली बौद्ध स्वयं को सनातन संस्कृति का ही एक पन्थ या सम्प्रदाय मानता है, पर नवबौद्धों की सनातनियों से एक स्वाभाविक खुन्दक होती है।
ख़ैर, अब देखिए कि देश के सर्वोच्च न्यायालय में कैसे-कैसे लोग न्याय की कुर्सी पर विराजमान हैं। एक हैं जस्टिस उज्ज्वल भुइयाँ। ये जनाब इस बात से दुखी हैं कि जस्टिस गवई ने इस मामले को ज़्यादा तूल क्यों नहीं दिया। जस्टिस भुइयाँ का जो बयान समाचारों में आया है, वह यों है—“जस्टिस उज्ज्वल भुइयाँ ने CJI के इस रुख़ से असहमति जताई। जस्टिस भुइयाँ ने कहा, “इस पर मेरे अपने विचार हैं, वह CJI हैं, यह मज़ाक़ की बात नहीं है।” जस्टिस भुइयाँ ने कहा कि यह घटना सर्वोच्च न्यायालय का अपमान है।”
यह बात तो सही है—‘वह CJI हैं, यह मज़ाक़ की बात नहीं है’—लेकिन भुइयाँ साहब, यदि CJI होना मज़ाक़ की बात नहीं है, तो फिर CJI को भी न्याय की कुर्सी पर बैठकर मज़ाक़बाज़ी तो नहीं ही करनी चाहिए। इस मामले में कम-से-कम जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने ठीक ही कहा—“ऐसी टिप्पणियों की कोई ज़रूरत नहीं थी। ये अनुचित थीं और ग़ैरज़रूरी थीं। इसका केस के क़ानूनी मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं था। जजों को कोर्ट में कम बोलना चाहिए; प्रवचन, उपदेश या व्याख्यान नहीं देने चाहिए।”
इसके अलावा, जस्टिस भुइयाँ के हिसाब से जस्टिस गवई पर जूता फेंकना सर्वोच्च न्यायालय का अपमान है। मैं पूछता हूँ कि आख़िर कैसे यह सर्वोच्च न्यायालय का अपमान है? क्या सर्वोच्च न्यायालय के सारे जजों की ओर से विष्णु की मूर्ति के मामले में सामूहिक बयान दिया गया था, जिससे वह वकील नाराज़ था या वह सिर्फ़ जस्टिस गवई के बयान से दुखी था? एक न्यायाधीश पर जूता-चप्पल उछालना यदि पूरे न्यायालय का अपमान है, तो फिर किसी एक नेता पर स्याही या जूता फेंकने को भी क्यों न पूरी राजनीतिक व्यवस्था का अपमान माना जाए? यदि न्यायालय कुछ विशिष्ट चीज़ है, फिर तो भ्रष्याचार के आरोपी जजों की लानत-मलामत को भी क्यों न पूरे न्यायालय का अपमान माना जाए?
अब ज़रा जस्टिस गवई की बहन जी को देखिए? ये मैडम कह रही हैं कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाली पीढ़ियाँ माफ़ नहीं करेंगी। इन बहन जी ने इस घटना को ज़हरीली मानसिकता का परिणाम बताया है। चलिए मोहतरमा, मान लिया कि जूता फेंकने की घटना के पीछे ज़हरीली मानसिकता है, लेकिन यह बताइए कि आपके भाई साहब जब किसी की आस्था को आहत कर रहे थे, तो क्या वे अपनी जिह्वा से अमृत वर्षा कर रहे थे?
तुलना नहीं करनी चाहिए, पर यह पूछने की हिमाक़त ज़रूर कर रहा हूँ कि जब भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारी मारने के लिए नहीं, बस बहरे कानों को सुनाने के लिए संसद में बम फेंक रहे थे, तो वह कौन-सी मानसिकता थी? अन्तर आख़िर इतना ही तो था कि वे देश की बात कर रहे थे और यह वकील धर्म-संस्कृति की बात कर रहा है, पर ईमानदारी की तुला पर दोनों ही मुझे बराबर दिख रहे हैं।
असल में तो इस घटना से सबसे ज़्यादा परेशानी बेचारे हमारे क्रान्तिकारी साथियों को हुई है। एक ज़ोरदार मुद्दा हाथ से फिसल गया है। अब तक वे यह मान रहे थे कि जूता उछालने वाला वकील पक्के तौर पर कोई पण्डित जी टाइप का होगा और इस तरह उनका हिन्दुत्व विरोध का एजेण्डा कुछ दिनों के लिए सुपरहिट रहेगा, पर दुर्भाग्य से जूतेबाज़ की कुण्डली दलित निकली। क्रान्ति के लिए सामने कोई ऐसा होना चाहिए, जिसे वे कह सकें कि वह ब्राह्मणवादी है।
बहरहाल, मैं जूते के साथ तो नहीं, पर जूतेबाज़ की भावना के साथ हूँ। यह भी मानकर चल रहा हूँ कि इस जूता काण्ड का कुछ-न-कुछ अच्छा असर कुछ दिनों तक ज़रूर रहेगा और जस्टिस गवई ऐसी टिप्पणियों के पहले थोड़ा सोच-विचार कर आगे बढ़ेंगे। (सन्त समीर)

