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कलमा पढ़वाकर मारने के पीछे का सच!

इस्लाम शुरुआत से ही युद्धरत रहा है, तो इसमें धर्म-परिवर्तन के लिए सहमति से आगे बढ़कर मारकूट और छल-छद्म का भी तरीक़ा अपनाया जा सकता है, भले ही क़ुरान कुछ और कहे। मेरे कहने का अर्थ यह है कि असल समस्या ख़ुद को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता में है, जो वर्तमान में स्पष्ट रूप से बचकानी है। इसे इस्लाम की शुरुआती परिस्थितियों के लिए जायज़ मानकर आज के लिए त्याग देना चाहिए।

पहली बार है और अच्छी बात है कि पहलगाम हमले का कश्मीर की मुसलमान जनता भी खुलकर विरोध कर रही है। मस्ज़िदों से उलेमाओं तक ने स्पष्ट रूप से इस आतङ्की घटना की निन्दा की, लेकिन दुर्भाग्य से कश्मीर से दूर 72 हूरों के सपने में खोए तमाम मूर्ख ऐसे भी हैं, जो पाकिस्तान की इस हरकत के लिए उसका शुक्रिया अदा कर रहे हैं। कुछ ऐसे लोग, जो ज़्यादा समझदार हो गए हैं, प्रगतिशील दिमाग़ रखते हैं, उनका हाल अजब है। एक सज्जन का कहना है कि यह नहीं कहना चाहिए कि आतङ्कियों ने हिन्दुओं के नाम पूछ-पूछकर, कलमा पढ़वा-पढ़वाकर उन्हें मारा, क्योंकि मरने वालों में एक मुसलमान भी है। इसे ही कहते हैं कि सब कुछ साफ़ होते हुए भी आँखों में धूल झोंकना। आज़ादी के बाद से ही ऐसे लोग हिन्दू-मुसलमान, दोनों के साथ ऐसा ही छल करते रहे हैं। इन महाशय को कौन समझाए कि कोई भला मुसलमान हिन्दुओं की मदद करता दिख जाए तो आतङ्की उसे भी मार देंगे, क्योंकि उनकी निगाह में वह काफ़िरों की मदद कर रहा है। कश्मीर के कुछ दशक पहले के नरसंहार में यही हुआ था। यहाँ तक कि मारकाट के दौरान क़बाइलियों को अपनी ही क़ौम की कोई ख़ूबसूरत लड़की दिख गई तो काफ़िरों की मददगार कहकर उसे भी बलात्कार का शिकार बनाया। क्यों न बनाते, आख़िर पाकिस्तान ने उनसे एक वादा यह भी किया था कि अल्लाह के काम में लगो, हम तुम्हें कश्मीर की ख़ूबसूरत लड़कियाँ देंगे।

एक जनाब ने क़ुरान की एक अच्छी-सी आयत लिखी—एक बेगुनाह का क़त्ल पूरी इनसानियत का क़त्ल है (सूरह अल-माइदा-5:32)। शानदार बात, पर इसके बाद उन्होंने शातिरपने वाला अपना एजेण्डा चलाना शुरू कर दिया। कुल मतलब यह था कि आज़ादी के बाद से ही हिन्दुओं ने मुसलमानों पर इतना ज़ुल्म ढाया है कि मुसलमान बेचारे क्या करें! कमाल है, इस्लाम के नाम पर एक अलग देश ले लिया, फिर भी शान्तिप्रिय सनातनियों का ज़ुल्म सहना पड़ रहा! ऐसे लोगों का वश चले तो स्थापित कर दें कि दुनिया में जहाँ-जहाँ मुसलमान जेहाद के नाम पर आतङ्क फैलाने में लगे हैं, वह सब हिन्दुओं के ज़ुल्मोसितम की वजह से है। ऐसे लोगों के हिसाब से जवाबदेही मुसलमानों की नहीं, सरकार की होनी चाहिए।

अजब है कि तमाम किन्तु-परन्तुओं के बावजूद भारत में हिन्दुओं के साथ मुसलमान जितने सुरक्षित और आज़ाद हैं, उतने वे दुनिया के किसी भी इस्लामी देश तक में नहीं हैं, फिर कुछ लोग इसे खुली आँखों से देखना और खुले दिमाग़ से समझना नहीं चाहते। हिन्दुओं की ओर से इक्का-दुक्का होने वाली वाली जिन घटनाओं पर हायतौबा मचाई जाती है, वे प्रतिक्रियात्मक अपवाद हैं, लेकिन उन पर भी निन्दा के स्वर सबसे ज़्यादा हिन्दुओं की ओर से ही उठते हैं। एजेण्डावीरों और ‘नैरेटिव’ गढ़ने वालों ने कम पढ़े-लिखे मुसलमानों को हिन्दुओं के ख़िलाफ़ भड़का-भड़काकर उनके मन में नक़ली डर पैदा करने का काम किया है, अन्यथा देश के किसी भी कोने में चले जाइए, सौ हिन्दू परिवारों के बीच दस-बीस मुसलमान परिवार सुरक्षित मिलेंगे, जबकि सौ मुसलमान परिवारों के बीच के दस-बीस हिन्दू परिवार पलायन की राह देख रहे होंगे।

खुली सोच का आदमी आसानी से सोच सकता है कि एक क़ौम अपना एक अलग देश ले ले, पर दूसरी क़ौम अपनी ही ज़मीन पर सुकून से रहने में मुश्किल महसूस करे तो देर-सबेर उसकी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया आएगी या नहीं? क्या अस्सी फ़ीसद आबादी का काम है शान्ति धारण किए रहना और पन्द्रह फ़ीसद का काम है जेहाद के मौक़े तलाशना? याद दिलाता चलूँ कि यहाँ मैं अच्छे मन के मुसलमानों की बात नहीं कर रहा, क्योंकि उन्हीं की वजह से थोड़ी बेहतरी बची हुई है, नहीं तो हम भी शायद पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान बनने की तरफ़ बढ़ रहे होते।

बहरहाल, सोचना तो पड़ेगा। मुसलमानों को ही सोचना पड़ेगा, क्योंकि सबसे गहरा दाग़ उनकी ही क़ौम के दामन पर है। सिर्फ़ भारत में नहीं, दुनिया भर में। जो मुसलमान समझते हैं कि क़ुरान को आतङ्क का आधार नहीं बनाया जा सकता, उन्हें क़ुरान की लोककल्याणकारी व्याख्याओं को सामने लाना पड़ेगा और ख़ुद को जेहादी बिरादरी से अलग साबित करना पड़ेगा। बिना सोचे काम न चलेगा कि क़ुरान की ऐसी कौन-सी व्याख्याएँ हैं, जो उसे ‘जियो और जीने दो’ के ख़िलाफ़ ले जाती हैं। यह कहने से भी काम नहीं चलेगा कि आतङ्क का कोई मज़हब नहीं होता। अगर आतङ्क का कोई मज़हब न होता तो हर क़ौम में आतङ्क का प्रतिशत लगभग आसपास होता। कुछ तो है इस्लाम की व्याख्याओं में जो मुसलमान नौजवानों को आसानी से बरगलाने का साधन बनता है।

मेरी निगाह में समस्या की जड़ में एक बात है, जिसे भले मुसलमानों को अब समझना ही चाहिए। इस्लाम के उत्स पर निगाह डालिए तो बात साफ़ होने लगेगी। तीन सम्प्रदाय या कहें मज़हब ऐसे हैं, जिनका उत्स एक है। यहूदी, ईसाई और इस्लाम। यहाँ मैं ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा, क्योंकि ‘धर्म’ अलग क़िस्म का शब्द है और नासमझी में कुछ लोगों ने इसे मज़हब, सम्प्रदाय या पन्थ के अर्थ में प्रचारित करने का ख़राब काम किया है। धर्म कर्तव्यबोध से जुड़ा है, व्यापक है, हमेशा सकारात्मक है; जबकि पन्थ, सम्प्रदाय, मज़हब बहुत अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी। धर्म कोई विचारधारा नहीं है, जबकि पन्थ, सम्प्रदाय, मज़हब विचारधाराएँ हैं। ‘धर्म’ शब्द के मूल में जो धातु है, वह इसे जीवन के सिद्धान्त की ओर ले जाती है, विचारधारा के नहीं। सम्प्रदायों में धर्म की बातें हो सकती हैं, पर ज़रूरी नहीं कि उनका सब कुछ धर्म ही हो। भारत में धर्म को सम्प्रदाय या पन्थ के अर्थ में कभी भी प्रयोग नहीं किया गया। बुद्ध ने अगर ‘धम्मं शरणं गच्छामि’ कहा, तो वह भी इसी भाव से कि इस संसार में अ-धर्म बहुत बढ़ गया है, इसलिए ‘धम्मं शरणं गच्छामि’!

ख़ैर…यहूदी, ईसाई और इस्लाम, जिन्हें हम सामी या सैमेटिक कहते हैं, तीनों का उत्स एक है। तीनों में एक बुनियादी साम्य है। अन्य विचारधारओं की अपेक्षा तीनों ख़ुद को श्रेष्ठ मानते हैं। यहूदियों का श्रेष्ठताबोध ऐसा है कि वे ख़ुद को ईश्वर की विशिष्ट रचनाओं के रूप में देखते हैं और अपनी विशिष्टता को हर हाल में बचाए रखना चाहते हैं। इसी नाते वे किसी और पन्थ या मज़हब के साथ घालमेल करने में विश्वास नहीं रखते। वर्ण-सङ्करता की स्थिति उन्हें नहीं सुहाती। वे किसी को छेड़ते नहीं और कोई उन्हें छेड़े, यह भी पसन्द नहीं करते। कोई छेड़े तो उसे छोड़ेंगे भी नहीं—की उनकी सामान्य मानसिकता है। ईसाई और इस्लाम की स्थिति यह है कि वे भी ख़ुद को अन्यों से श्रेष्ठ मानते हैं, पर यह भी मानते हैं कि जो उनकी राह पर नहीं है, वह ग़लत राह पर है, इसलिए उसे सही रास्ते पर लाना उनकी ज़िम्मेदारी है। सही रास्ते पर लाने की यही ज़िम्मेदारी निभाने के लिए वे ‘धर्म-परिवर्तन’ (इसे ‘पन्थ-परिवर्तन’ कहना चाहिए) का समर्थन करते हैं और अवसर मिले तो ‘धर्म-परिवर्तन’ कराने का अभियान भी चलाते हैं। चूँकि ईसा मसीह के साथ सेवा-करुणा का भाव जुड़ा है, इसलिए ईसाई परोक्ष रूप में भले ही लालच दें या कुछ मारपीट करें, पर प्रत्यक्ष रूप में सेवा का तरीक़ा अपना कर धर्म-परिवर्तन कराते हैं। सेवा का यह तत्त्व ही है, जिसके नाते ईसाइयों ने समय के साथ ख़ुद को बहुत बदला है और ज्ञान-विज्ञान को अपना साथी बनाया है।

इस्लाम शुरुआत से ही युद्धरत रहा है, तो इसमें धर्म-परिवर्तन के लिए सहमति से आगे बढ़कर मारकूट और छल-छद्म का भी तरीक़ा अपनाया जा सकता है, भले ही क़ुरान कुछ और कहे। मेरे कहने का अर्थ यह है कि असल समस्या ख़ुद को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता में है, जो वर्तमान में स्पष्ट रूप से बचकानी है। इसे इस्लाम की शुरुआती परिस्थितियों के लिए जायज़ मानकर आज के लिए त्याग देना चाहिए। भारत के ज्ञात इतिहास में यह श्रेष्ठताबोध कभी नहीं रहा है। जातीय श्रेष्ठताबोध की कुछ विकृतियाँ ज़रूर हैं, पर स्पष्ट रूप से वे विकृतियाँ ही हैं और बहुत बाद की हैं। मनुष्य सीख-सीखकर बड़ा होता है, इसलिए अपनी संस्कृति की शिक्षा ठीक से न दी जाए तो स्वाभाविक रूप से विकृतियाँ आ ही सकती हैं, हालाँकि सनातन संस्कृति की वास्तविकता यही है कि यह जीवन मात्र का सम्मान करती है। यह चींटी और हाथी, दोनों की आत्मा को समान देखती है। यह किसी को सही रास्ते पर लाने के लिए अभियान नहीं चलाती, बल्कि हर किसी को अपनी अलग राह चुनने की आज़ादी देती है। सनातन संस्कृति में अनगिनत पन्थ, सम्प्रदाय हो सकते हैं। यहाँ हर गाँव, हर परिवार का अपना अलग कुल देवता हो सकता है। नास्तिक भी यहाँ अपना ही अङ्ग है। कोई चाहे तो साकार माने या निराकार।

सनातन संस्कृति में यह सब इसलिए हुआ कि यह संस्कृति मानती है कि हम सत्य की खोज के लिए जन्मे हैं। लड़ना नहीं विमर्श करना है। आदमी को नहीं, सच को पकड़ना है। सच का जब तक साक्षात्कार न हो जाए, नेति-नेति कहकर आगे बढ़ते जाना है। लक्ष्य सत्य की अन्तिम सीमा, यानी परम सत्य या कि मोक्ष तक पहुँचना है। आज अगर कुछ लोग हिन्दुत्व के लिए कभी-कभार लाठी-डण्डे भाँजते दिखाई देते हैं, तो वह प्रतिक्रियास्वरूप और स्वाभाविक होते हुए भी सही नहीं है। आपद्धर्म की स्थिति मानी गई है, पर तय किया गया है कि आपद्धर्म की स्थिति कब आती है। ‘जियो और जीने दो’ सनातन संस्कृति के मूल में है। नास्तिक चार्वाक उधार लेकर घी पीने की बात कहते हुए भी किसी की जेब काटने की बात नहीं करते। ‘जियो और जीने दो’ सांस्कृतिक अन्तर्धारा है। इसी नाते सनातन को मानने वाला मांसाहारी भी स्वीकार करेगा कि आदत की वजह से वह मांसाहार भले करता है, पर यह सही नहीं है। जिस भी काम से किसी की जान जाती हो, वह शेर-चीते के लिए सही हो सकता है, मनुष्य के लिए ग़लत है। यही ‘जियो और जीने दो’ जब चरम पर पहुँचता है तो महावीर वाणी बन जाता है। ‘जय जिनेन्द्र’ का उद्घोष करता जैनत्व की तरफ़ बढ़ता व्यक्ति ज़मीन खोद कर गाजर, मूली की जड़ निकालने से भी बचता है कि अनजाने में कहीं किसी की हत्या न हो जाए।

कुल मतलब इतना है कि हिन्दुओं को मुसलमानों के साथ रहने में कभी कोई परेशानी नहीं रही। आज यदि कुछ-कुछ परेशानी पैदा हो रही है तो एक अनजाने, लेकिन स्वाभाविक भय के कारण, जिसे बताने की बहुत ज़रूरत नहीं है। हिन्दू-मुसलमान के बीच तनाव का माहौल न हो तो आप देख सकते हैं कि एक सामान्य हिन्दू दरगाह, मज़ार कहीं भी जा सकता है। इसे नमाज़ सिखा दीजिए तो यह मस्ज़िद में श्रद्धाभाव से पहुँच कर नमाज़ भी पढ़ सकता है, पर अगर इसे आप मुसलमान बनाना चाहेंगे तो मुश्किल पैदा होगी और यही वैमनस्य की जड़ है।

जो भी हो, श्रेष्ठताबोध की ख़ुमारी छोड़ समझदार मुसलमानों को समझना तो पड़ेगा कि ऐसा क्यों है कि दुनिया की लगभग 200 करोड़ की मुसलमान आबादी न कोई ढङ्ग का वैज्ञानिक पैदा कर पाती है और न ही दार्शनिक; उधार के विज्ञान से काम चलाती है, जबकि पिद्दी-सा देश इज़रायल वैज्ञानिक खोजों के मामले में नोबेल पुरस्कारों की झड़ी लगा देता है। मज़ेदार है कि जो मुसलमान इज़रायल को पानी पी-पीकर कोसते रहते हैं, वे तक अपना एक भी दिन बिना इज़रायली तकनीक का सहारा लिए नहीं बिता सकते। उन्हें पता ही नहीं है कि उनकी तमाम घरेलू चीज़ों तक में इज़रायल घुसा हुआ है। यदि किसी अच्छे वैज्ञानिक का नाम मुसलमान जैसा लगता भी है तो ध्यान देने पर पता चलता है कि वह प्रचलित इस्लामी रीति-रिवाजों पर चलता ही नहीं, बल्कि उसकी दिनचर्या कुछ उल्टी ही रही है। सबके प्रिय शानदार भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कलाम को ही देख लें तो वे सबके साथ उठते-बैठते थे। भगवद्गीता उनके मन में बसी थी और जीवनविद्या के प्रवर्तक बाबा नागराज तक के प्रशंसक थे।

इस प्रकृति का सबसे बड़ा सच विज्ञान है। जब तक विज्ञान परदे में था, उसका दरवाज़ा ठीक से खुला नहीं था, तब तक आप लाठी, भाला, तलवार, कामचलाऊ बारूद, तमञ्चे वग़ैरह से अपना वर्चस्व बना सकते थे, पर अब यह नहीं चलेगा। उलेमाओ! आपको चाहिए कि पड़ोसी से ज़्यादा आप अपने गिरेबान में झाँकें, इस्लाम की ‘जियो और जीने दो’ वाली व्याख्याएँ सामने लाएँ और मिलजुलकर देश बनाने का सपना देखें। ऐसा होगा तो यक़ीन मानिए, जिन हिन्दू सङ्गठनों के नाम पर आपको नक़ली डर दिखाया जाता रहा है, वे सब आपका स्वागत करते मिलेंगे। नक़ली डर इसलिए कह रहा हूँ कि यह असली होता तो अस्सी फ़ीसद हिन्दू आबादी वाले देश में पन्द्रह फ़ीसद मुसलमान अपनी आबादी बढ़ाते हुए अब तक सुरक्षित न रह पाए होते। सच यही है कि आप विश्वास दिलाएँ तो इस देश का हिन्दू जैसे अतीत में गले मिलने को तैयार खड़ा था, वैसे ही आज भी मिलेगा। बार-बार का धोखा खाया हुआ सदियों का सहमा यह शान्तिप्रिय प्राणी अब कुछ अच्छे तो कुछ प्रतिगामी और प्रतिक्रियात्मक तरीक़े से जाग रहा है। यदि चीज़ें सही दिशा में न रहीं तो कुछ नहीं पता कि आने वाले दिनों में माहौल समरसता का बनेगा या वैमनस्यता का, क्योंकि जब समस्या भीड़ को सौंप दी जाती है तो समाधान शोर में बदल जाता है। (सन्त समीर)

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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