विमर्शसिनेमा

‘गदर-2’ के गदर मचाने का राज़!

मेरी नज़र में ‘लगान’ इतिहासबोध की फ़िल्म थी, यह हमें ज़िन्दगी के कुछ फलसफे सिखाती है। इतिहासबोध का एक रूप ‘गदर’ में भी है, पर इससे बहुत आगे यह हमारी संवेदनाओं को गहरे तक स्पर्श करती है। कोई फ़िल्म अगर आपकी आँखें रह-रहकर नम करने लगे तो समझिए कि वह आपके भीतर कुछ बदल रही है। ‘गदर’ देखकर हाल से बाहर निकलता हुआ दर्शक ख़ुद को कुछ बदला हुआ महसूस कर रहा था। तमाम पाकिस्तान विरोध के बावजूद धर्मबहिः सकीना को वह अपने परिवार का हिस्सा मानने को तैयार था।

एक तरफ़ फिल्मी पण्डित दे रहे हों डेढ़ स्टार, दो स्टार और अधिकतम तीन स्टार; और दूसरी तरफ़ कमाई के तमाम रिकॉर्ड लगातार टूटते नज़र आएँ तो सोचना पड़ेगा कि आख़िर ‘गदर-2’ में वह कौन-सी चीज़ है, जिसके लिए देश की जनता सिनेमाहाल तक पहुँचने को बेताब है। कमाई की बात लेख के आख़िरी हिस्से में करूँगा कि कैसे इस फ़िल्म ने इतिहास रच दिया है और जिस ‘पठान’ से तुलना की जा रही है, वह इसके सामने कहीं नहीं टिकती। फिलहाल, बात इस बात पर कि यह फ़िल्म निर्मिति के किस धरातल पर खड़ी है।

‘गदर-2’ बाईस साल पहले की ‘गदर : एक प्रेमकथा’ की सीक्वल है, तो उसके साथ इसकी तुलना होगी ही होगी। सवाल है कि ‘गदर-2’ पहले वाली ‘गदर’ को निभा पाई है या नहीं!

दर्शकों की अजब-ग़ज़ब प्रतिक्रिया है। ज़्यादातर इसे पाँच में से पाँच स्टार दे रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे पहली वाली ‘गदर’ से कमज़ोर कह रहे हैं तो कुछ को इसका इण्टरवल से पहले का हिस्सा कमज़ोर और लम्बा खिंचा हुआ लग रहा है। अलबत्ता, इस बात पर सबकी राय एक जैसी है कि सनी देओल जब पर्दे पर अवतरित होते हैं तो छा जाते हैं और उनकी भावभङ्गिमा के आगे कोई नहीं टिकता।

यह रही जनता-जनार्दन और फ़िल्म समीक्षकों की बात। अब अपनी बात करता हूँ। मेरी नज़र में ‘गदर-2’ पहली वाली ‘गदर’ से ज़्यादा बार पीछे तो यदा-कदा आगे निकलती नज़र आती है। पहली वाली ‘गदर’ ने शुरू में जो लय पकड़ी तो अन्त तक उसे बनाए रखा था। उस ‘गदर’ में एक भी दृश्य ऐसा नहीं मिलेगा, जिसे कमज़ोर कहा जाए। ‘गदर-2’ लय पकड़ने की कोशिश करती है, पकड़ती भी है, पर कुछ ही देर में पटरी से उतरने लगती है। यह आशा जगाती है, फिर लगता है कि निराश कर रही है और तभी फिर से आशा जगाने लगती है। दर्शक आशा-निराशा के बीच झूलता रहता है और इण्टरवल के बाद थोड़ा आश्वस्त होता है। पहली वाली ‘गदर’ के दर्शकों को इस ‘गदर-2’ से जिस चीज़ की उम्मीद थी, वह इसमें है ज़रूर, पर उसकी ऊँचाई या दूसरे अर्थों में कहें तो गहराई कुछ कम है।

पहली वाली ‘गदर’ पारिवारिक संवेदना की, प्रेम की, एक विशिष्ट क़िस्म के देशप्रेम से पगी फ़िल्म थी। उस ‘गदर’ में भारत-पाकिस्तान की चिर-परिचित कलह थी, पर वह पारिवारिक संवेदनाओं और प्रेम की विशिष्ट भावदशा की पूरक की तरह थी। ‘गदर-2’ पर कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि यह ‘हिन्दू-मुसलमान’ करती है, पर सच यह है कि यह ‘हिन्दू-मुसलमान’ नहीं, बल्कि ‘भारत-पाकिस्तान’ करती है। हालाँकि ‘गदर-2’ का यह ‘भारत-पाकिस्तान’ पहली वाली ‘गदर’ के ‘सेण्टिमेण्ट’ तत्त्व को ढँकता हुआ दिखाई देता है। हाँ, जब-जब ‘भारत-पाकिस्तान’ शुरू होता है तो वह ज़बरदस्त दिखता है और प्रभाव छोड़ता है। पहली वाली ‘गदर’ में प्रेम कहानी प्रभावी रही थी, बाक़ी चीजें उसे सहारा दे रही थीं, पर ‘गदर-2’ में मेरे हिसाब से ‘भारत-पाकिस्तान’ कुछ ज़्यादा प्रभावी हो गया है। बावजूद इसके, ‘गदर-2’ भी उस मूल ‘सेण्टिमेण्ट’ को पकड़कर ही आगे बढ़ती है, जिसकी हमारे पारिवारिक जीवन में कमी हो गई है। यहीं पर इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि पहले वाली ‘गदर’ के समय भी समीक्षकों ने उलटी टिप्पणियाँ की थीं, पर उसने बॉक्स आफ़िस के तमाम रिकार्ड धराशायी कर दिए थे। ‘लगान’ उसी के साथ रिलीज़ हुई थी और उसे महान् फ़िल्म बताया गया था। ‘लगान’ अच्छी फ़िल्म थी भी, पर ‘गदर’ की ‘लगान’ से तुलना करते हुए विश्लेषण के प्रचलित दायरे से बाहर झाँकना पड़ेगा।

मेरी नज़र में ‘लगान’ इतिहासबोध की फ़िल्म थी, यह हमें ज़िन्दगी के कुछ फलसफे सिखाती है। इतिहासबोध का एक रूप ‘गदर’ में भी है, पर इससे बहुत आगे यह हमारी संवेदनाओं को गहरे तक स्पर्श करती है। कोई फ़िल्म अगर आपकी आँखें रह-रहकर नम करने लगे तो समझिए कि वह आपके भीतर कुछ बदल रही है। ‘गदर’ देखकर हाल से बाहर निकलता हुआ दर्शक ख़ुद को कुछ बदला हुआ महसूस कर रहा था। तमाम पाकिस्तान विरोध के बावजूद धर्मबहिः सकीना को वह अपने परिवार का हिस्सा मानने को तैयार था। यही संवेदना या सेण्टिमेण्ट भारतीयता की वह विशिष्टता है, जिसके इर्दगिर्द सनी देओल ने अपनी एक छवि बनाई है, जो तारा सिंह के रूप में अपने परिवार के लिए कोई भी ख़तरा उठा सकता है। इसे पारिवारिकता से भी आगे भारतीयता की संवेदना कहना चाहिए। छीजते हुए मूल्यों और निष्ठुरता के इस दौर में संवेदना का यही वह तत्त्व है, जिसे हमारे फ़िल्मी समीक्षक समझने में चूक कर जाते हैं।

पहली वाली गदर के गानों में भी भारतीयता की संवेदना अद्भुत तरीक़े से व्यक्त हुई है। भारतीय फ़िल्मों ने गाने तो एक-से-एक दिए हैं, पर गदर के गाने अपनी कहानी की लय में जिस तरह से साथ देते हैं, वैसा मैंने किसी और फ़िल्म में नहीं देखा। ‘उड़ जा काले कावाँ…’ की धुन बजनी शुरू होती है तो उतने मात्र से जैसे ‘गदर’ की भूमिका बनने लगती है। ‘गदर-2’ में उन पुराने गानों को कुछ अलग ढङ्ग से और अच्छे से इस्तेमाल किया गया है, फिर भी इस वाली के दृश्य पुरानी वाली से ऊपर नहीं जा पाते।

जो भी हो, ‘गदर-2’ को देखने के लिए उमड़ी भीड़ ने तमाम समीक्षाओं को अगर अप्रासङ्गिक बना दिया है तो ‘गदर’ के ‘सेण्टिमेण्ट’ तत्त्व के सहारे ही इसे समझा जा सकता है। ‘गदर-2’ भी रह-रहकर आँखें भिगोती है और बार-बार पुरानी ‘गदर’ की याद दिलाती है। भले ही यह बनती-बिगड़ती लय की फ़िल्म है, पर कुछ संवाद कुछ दृश्य हैं, जो भीतर तक असर करते हैं। जिस तरह से लोग ट्रैक्टरों में भर-भरकर फ़िल्म देखने जा रहे हैं, उसे देखने से समझ में आता है कि इसके दर्शकों में आम लोगों की सङ्ख्या बहुत बड़ी है और आम आदमी की संवेदना को छूने वाले तत्त्व और उसके मनोरञ्जन की सामग्री इस फ़िल्म में मौजूद हैं। तमाम लोग ऐसे हैं, जिन्हें समझ में नहीं आ रहा कि इस फ़िल्म को अच्छी कहें या ख़राब, वे भी इसे देखकर बोर नहीं महसूस करते। फ़िल्म की बुनावट ऐसी है कि यह नासमझों को शानदार लगेगी, तो समझदारों की एक बड़ी सङ्ख्या को बेकार। असल में काफ़ी दिनों से आम आदमी के मन को छूने वाली फ़िल्में बनना बन्द-सी हो गई थीं। इस फ़िल्म ने अस्सी-नब्बे के दशक की मानसिकता के दर्शकों के मर्म को भी छुआ है और सनी देओल के अभिनय में एक देशीपन है, इसलिए अस्सी साल की एक महिला भी सिनेमाहाल की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए नज़र आ रही है।

यह सही है कि सनी देओल का अपने किरदार में कोई जवाब नहीं। सनी अपनी शैली का सन्देश देने में कामयाब रहे हैं। जिन्हें लगता है कि ‘गदर-2’ कोई सन्देश नहीं दे पाती, उन्हें इसके कुछ संवादों पर ध्यान देना चाहिए। जब तारा सिंह जीते को गीता और मुस्कान को क़ुरान के रूप में सामने करते हुए पाकिस्तानी जनरल से गीता और क़ुरान में से एक चुनने को कहता है और पाकिस्तानी जनरल जान बचाने के लिए गीता का नाम लेता है तो तारा सिंह ग़ुस्से में कहता है कि क्या दोनों बच्चों को गले नहीं लगा सकते थे, तो वास्तव में यह सन्देश साम्प्रदायिक सद्भाव के तमाम सन्देशों पर भारी पड़ता है। जहाँ तक कहानी की बात है, तो ऐसा नहीं है कि कहानी एकदम बेकार हो; अलबत्ता, इण्टरवल के पहले दो-चार ट्विस्ट की ज़रूरत थी। थोड़ी और मेहनत की गई होती तो यह सचमुच शानदार फ़िल्म बन जाती। अमीषा पटेल के किरदार पर और काम करने की ज़रूरत थी, क्योंकि पुरानी वाली ‘गदर’ की वे विशिष्टता थीं। ‘गदर-2’ को देखते हुए कई बार लगता है जैसे कि अमीषा को पहली ‘गदर’ का बोझ ढोना पड़ रहा है। उत्कर्ष शर्मा बेकार तो नहीं, पर सामान्य से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। कुछेक जगहों पर ज़रूर उनका काम बढ़िया है। मुस्कान के रूप में सिमरत कौर के किरदार को भी कुछ विस्तार की ज़रूरत थी। यह लड़की ठीक काम कर सकती थी, पर उसका चरित्र अविकसित रह गया। असली फ़िल्म इण्टरवल के बाद शुरू होती है, जबकि सनी देओल इसे अपने कन्धों पर उठा लेते हैं। आख़िरी दृश्य में जब खलनायक अनजाने में भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाता है तो वह भी दिलचस्प है, पर इसके ठीक बाद के और एकदम अन्त के दो-तीन मिनटों पर और काम किया जाना चाहिए था। व्यक्तिगत तौर पर कहूँ तो इस फिल्म को देखने के बाद पछतावा तो नहीं था, पर पहली वाली ‘गदर’ की लय की कमी महसूस हो रही थी। आमिर ख़ान ने इसे देखने के बाद भूरि-भूरि प्रशंसा की है, लेकिन मैं उनसे ज़्यादा सहमत नहीं हूँ।

अब बात करते हैं इसकी ज़बरदस्त कमाई पर। पहले दिन 40.10 करोड़, दूसरे दिन 43.08 करोड़, तीसरे दिन 51.70 करोड़, चौथे दिन 38.70 करोड़, पाँचवें दिन 55.40 करोड़ और छठे दिन की कमाई 32.37 करोड़ रुपये। यों पहले पाँच दिनों में शाहरुख़ ख़ान की ‘पठान’ ने इससे ज़्यादा कमाई की थी, पर छठे दिन ‘गदर-2’ ने भारत में बनी अब तक की सभी फ़िल्मों का रिकार्ड तोड़ दिया है। ‘गदर-2’ की ‘पठान’ से बार-बार तुलना की जा रही है, पर यह तुलना करते हुए दोनों की रिलीज़ की स्थितियों की भी तुलना की जानी चाहिए। पहली बात यह कि हम जानते हैं कि ‘पठान’ के गाने को लेकर जो विरोध हुआ, उसने उसे अतिरिक्त चर्चा में ला दिया था, जिसकी वजह से कुतूहल में मेरे जैसे तमाम लोगों ने भी फ़िल्म देखी। ‘गदर-2’ की बात करें तो इसके लिए किसी छद्म प्रचार का सहारा नहीं लिया गया। तमाम समीक्षकों की फ्लॉप घोषित करने वाली टिप्पणियों के बावजूद आम लोग इसे ब्लॉकबस्टर बना रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि जहाँ बड़ी ‘ओपनिङ्ग’ करने वाली दूसरी तमाम फ़िल्मों की कमाई दूसरे दिन से घटने लगी थी, वहाँ ‘गदर-2’ की कमाई दूसरे-तीसरे दिन बढ़ती हुई दिखी।

‘पठान’ के समय कोई और फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई थी, इसलिए टिकट के दाम मनमाने ढङ्ग से ‘गदर-2’ की तुलना में 70 रुपये ज़्यादा रखे गए थे। इसके अलावा, मैदान ख़ाली होने की वजह से ‘पठान’ को लगभग पाँच हज़ार स्क्रीन मिल गई थीं, जबकि ‘गदर-2’ को सिर्फ़ 3500 स्क्रीन ही मिल पाईं। ‘पठान’ की कमाई को काटने वाली कोई और फ़िल्म नहीं थी, जबकि ‘गदर-2’ की कमाई को ‘ओएमजी-2’ , ‘जेलर’ और ‘भोला शङ्कर’ काट रही थीं। ‘गदर-2’ की रिलीज़ की स्थिति ‘पठान’ जैसी होती, तो स्पष्ट रूप से इसके अब तक के हर शो की कमाई ‘पठान’ की तुलना में 20 से 25 करोड़ रुपये अधिक होती। याद रखना चाहिए कि टिकट के दाम में सिर्फ़ 70 रुपये के फ़र्क़ से ही हाउसफुल फ़िल्म पर साढ़े तीन या चार हज़ार स्क्रीन के हिसाब से 10-15 करोड़ का अन्तर आ जाता है। जब टिकट लेने वालों की भीड़ लगी हो तो स्क्रीन सङ्ख्या की भूमिका बहुत बड़ी हो जाती है। ‘गदर-2’ के मामले में हुआ यह है कि लोग टिकट ख़रीद कर पैसा देने को तैयार बैठे थे, पर ‘गदर-2’ को जो गुल्लक मिली, उसमें ज़्यादा पैसे जमा ही नहीं हो सकते थे। यह भी समझना चाहिए कि ‘पठान’ के समय ‘ओएमजी-2’ और दक्षिण की ‘जेलर’ जैसी फ़िल्में रिलीज़ हुई होतीं तो ‘पठान’ का हाल क्या होता। ‘गदर-2’ की छठे दिन की कमाई भी बताती है कि दम दिखाने के समय पर इस फ़िल्म ने दम दिखाया है। साफ़ अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘पठान’ ‘गदर-2’ की तरह ‘ओएमजी-2’, ‘जेलर’ और ‘भोला शङ्कर’ जैसी फ़िल्मों के साथ 70 रुपये कम दाम पर 3500 हज़ार स्क्रीन पर रिलीज़ हुई होती तो उसकी कमाई कितनी होती। वास्तव में ‘शाहरुख़ ख़ान बनाम सनी देओल’ की बहस को किनारे कर दें तो वस्तुस्थिति यही है कि ‘गदर-2’ ने सिनेमाहाल के बाहर जो मञ्ज़र पैदा किया है, उसने विश्लेषणों के तमाम गणितीय धन-ऋण को इधर-उधर कर दिया है। देखना यही है कि आगे यह कहाँ तक जा पाती है। (सन्त समीर)      

सन्त समीर

लेखक, पत्रकार, भाषाविद्, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के अध्येता तथा समाजकर्मी।

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